जैन व्यंजन- सादा भोजन, स्वाद अपार

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खान-पान भारतीय संस्कृति का हिस्सा है। हमारे देश में धर्म और समुदाय की पहचान भी खान-पान से होती है। वक्त से साथ अगर संस्कृति का स्वरूप बदल रहा है, …तो इससे स्वाद भी अछूता नहीं रहा। फास्ट फूड के जमाने में चूल्हे की आंच पर धीरे-धीरे पकने वाली खिचड़ी भी कभी मैक्सिकन, तो कभी इटेलियन हो रही है। ‘मैथी मठरी विद मेल्टिंग चीज’, पिज्जा पापड़ी चाट और बाजरा कॉटेज चीज पिज्जा जैसे नए फ्लेवर यूथ की जुबान पर चढ़ चुके हैं। संस्कृति और स्वाद के इस फ्यूजन में अब जैन रसोई और भोजन भी शामिल हो चुके हैं। कंडे की राख में सिकने वाली राजस्थानी बाटी अब इंग्लिश स्ट‌फिंग के साथ ओवन में घुस चुकी है।

टेस्ट बदला, धर्म नहीं

जैन आहार भी अपने धर्म की तरह ही कई गुणधर्मों को समेटे हुए सीमित है। तमस से दूर शुद्ध रूप से सात्विक आहार जैन रसोई की पहचान है। यह पहचान कई चुनौतियों के बाद बनी है। आयुर्वेद की तरह ही जैन धर्म में भी मौसम के अनुकूल आहार लेना, गर्म पानी पीना, सूर्यास्त से पहले आहार करना प्रमुख विशेषता है। इन नियमों का पालन सहूलियत के हिसाब से होता है, लेकिन प्याज, लहसुन, आलू और कंद जैसी वर्जित सब्जियों के बिना देश-विदेश के रेस्त्रां में प्रमुखता से बिकने वाली जैन डिशेज नया रूप ले चुकी हैं। खास बात यह है कि इनमें भी अभाज्य पदार्थ वाले नियम का पालन हो रहा है।

पुराना स्वाद, नया रूप

मुंबई में जैन कैटरर्स चलाने वाले मशहूर ललित जैन बताते हैं कि उनके मैन्यू में हजारों आइटम हैं। हर 6 महीने या सीजन में मैन्यू भी बदलता है, लेकिन सबसे बड़ी बात है कि पूरा मैन्यू जैन शास्त्रों में बताए गए नियमों के अनुसार तैयार किया जाता है। ललित चुनौती देते हुए कहते हैं कि दुनिया की ऐसी कोई भी डिश नहीं, जो अब जैन पद्धति से न बनाई जाती हो। इनमें कॉन्टिनेंटल टेस्ट के साथ परंपरा का फ्यूजन भी है, जैसे हंडवा पिज्जा। हंडवा एक पारंपरिक डिश है, जिसे पिज्जा स्टाइल में बनाया जाता है। राजस्थान की पारंपरिक मिठाई घेवर को भी कॉन्टिनेंटल घेवरी के तौर पर परोसा जा रहा है।

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