महाराष्ट्र के धुलिया में मिली नंदीश्वर द्वीप की प्राचीन प्रतिमा

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महाराष्ट्र के ध्ुलिया जिले के अंतर्गत दोंडाईचा से 4 किमी दूरी पर रामी गांव के किसान गंगाबाई रामभाऊ माल के खेत में हल चलाते समय पंचधतु की 11 इंच ऊंची नंदीश्वर द्वीप की प्राचीन प्रतिमा प्राप्त हुई, जो 2000 वर्ष प्राचीन है, जिसका वजन 4 किलो 250 ग्राम है, यह प्रतिमा जैन पुरातत्व तथा मूर्ति कला की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस प्रतिमा के चारों ओर 13 मूर्तियां अर्थात् 52 मूर्तियां हैं, जिसे जैन गं्रथों के अनुसार नंदीश्वर दीप 52 चैत्यालय कहते हैं, तीन खंड वाले इस प्रतिमा के नीचे के हिस्से में बीच में चारों ओर पद्मासन एक-एक बड़ी प्रतिमा है, उसके दोनों ओर चार-चार मूर्तियां अर्थात् 15 मूर्तियां हैं, बीच के प्रत्येक दिशा में पांच-पांच अर्थात 20 मूर्तियां हैं और ऊपर के प्रत्येक दिशा में तीन-तीन अर्थात् 12 प्रतिमाएं हैं, इस प्रकार 52 प्रतिमा हैं, सभी पद्मासन मूर्तियां हैं, मूल बड़ी प्रतिमा के नीचे पूरा लीपी में प्रशस्ति अंकित हैं जिसके सर्वेक्षण से इस प्रतिमा की प्राचीन वस्तुस्थिति का ज्ञात हो सकता है, जैन आगम के अनुसार नंदीश्वर दीप अकृत्रिम चैत्यालय है, जहां चार अंजनगिरि, 16 दध् िमुख और 32 रतीकर अर्थात 52 जिन मंदिर है, चारों प्रकार ज्योतिषी, वान व्यंतर, भवनवासी और कल्पवासी देव यहां पूजा करते हैं, जैन समाज के अष्टान्हिका अर्थात् कार्तिक पफाल्गुन और आषाढ़ माह के अंतिम के आठ दिन यहां की पूजा करने का विशेष महत्व है, इस अष्टान्हिका पर्व पर मंडल विधान, पूजा, आराध्ना की जाती है, यह मूर्ति किसान ने दोंडाईचा पुलिस अध्ीक्षक को सौंपी है, परिसर के दिगम्बर समाज को यह समाचार मिलने के पश्चात् वहां के पुलिस अध्ीक्षक, तहसीलदार, कलेक्टर तथा स्थानीय विधायक को श्री भारतर्षीय दिगम्बर जैन ;तीर्थ संरक्षिणीद्ध महासभा ध्ुलिया के प्रतिनिध प्रमोद अजमेरा, संतोष पाटनी, किशेर शहा, भरत जैन, महेंद्र जैन ध्ुलिया, नंदुरबार जलगांव, नासिक तथा परिसर की जैन समाज ने मूर्ति जैन समाज को सौंपी जाए, का निवेदन किया। इस कार्य के लिए पारस लोहाड़े ;नासिकद्ध उपाध्यक्ष तीर्थ संरक्षिणी महासभा, महावीर ठोले ;औरंगाबादद्ध महामंत्राी तीर्थ संरक्षिणी महासभा, प्रकाश पाटनी ;औरंगाबादद्ध अध्यक्ष तीर्थ संरक्षिणी महासभा आदि विशेष प्रयासरत् है, यह जानकारी तीर्थ संरक्षिणी महासभा के महामंत्राी महावीर ठोले औरंगाबाद ने दी।

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