चारित्रा चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर महाराज का जीवन चरित्रा तथा संस्मरण

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शान्तिसागर जी महाराज पर सर्प ने दो बार उपसर्ग किया तथा इनके सामने शेर कई बार आया था मुक्तागिरी में, श्रवणबेलगोला में, सोनागिरी सि( क्षेत्रा में, द्रोणगिरी में इत्यादी।

आचार्य श्री प्रतिदिन आगम के 50 पन्नांे का स्वाध्याये करते थे, आचार्य पद सम्डोली, महाराष्ट्र में प्राप्त हुआ था, गजपंथ सि( क्षेत्रा में आचार्य श्री को ‘‘चारित्रा चक्रवर्ती’’ पद से विभूषित किया गया था, अपने गुरु आचार्य देवेन्द्र कीर्ति जी महाराज को पुनः दीक्षा देकर ये शान्तिसागर जी गुरु के गुरु कहलाये थे, पुनः दीक्षा का कारण ये था की जब आहार के लिए चटाई इत्यादि ओढ़ कर आते थे तो उनको इस बात का एहसास हुआ की ये जो कार्य दिगम्बर मुद्रा में किया है ये अनुचित है इसलिए हमें वापस दीक्षा लेना होगा।

आचार्य शान्तिसागर जी महाराज ने णमोकार मंत्रा के अठारह करोड़ जाप किये थे, ध्वल, महाध्वल, जयध्वल ग्रंथो को ताम्र पात्रा पर खुदवा कर आचार्य श्री ने सि(ांत ग्रंथो की रक्षा की थी, आज वो ताम्र पात्रा पफलटन में सुरक्षित हैं।
‘‘भगवान की वाणी पर पूर्ण विश्वास करो, इसके एक-एक शब्द से मोक्ष पा जाओगे। इस पर विश्वास करो। सत्य वाणी यही है कि एक आत्म-चिन्तन से सब साध्य है और कुछ नहीं है।’’ – आचार्य श्री शांतिसागर महाराज

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