चातुर्मास : जिनागम पंथ का अनुपम उपहार

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जिनागम पंथ प्रवर्तक भावलिंगी संत श्रमणाचार्य विमर्शसागर मुनि

अहा! चक्रवर्ती भरत के भारतदेश की पवित्र भूमि पर विचरण करते परम वीतरागी दिगम्बर श्रमण-श्रमणियों, उत्कृष्ट श्रावक-श्राविकाओं, अरिहंत कथित जिनागम पंथ में दृढ़ श्रद्धा रखने वाले जिनोपासक – श्रमणोपासकों एवं सद् गृहस्थों के द्वारा परम अहिंसा धर्म का शंखनाद सदा से होता आ रहा है। सभी ‘‘परस्परोग्रहो जीवानाम्’’ सूत्र सूक्ति को चरितार्थ करते हुये ‘हम सम्यग्दृष्टि हैं’ ऐसी अनुभूति करते हैं। राग-द्वेष, बैर-विरोध, छल-ईष्र्या से रहित निर्मल आत्मगुणों की उपासना करना ही मनुष्य जीवन का सार है।

चातुर्मास – 2021 निश्चय-व्यवहार अहिंसा के पथ पर सतत् गतिमान निर्ग्रन्थ वीतराग श्रमणों के लिए विशिष्ट आत्मसाधना का अभिनन्दनीय अवसर है।

आशा है सर्वत्र ‘गुण ग्राहकता’ की भावना करते हुए सभी जिनशासन की छबि को उज्जवल रखने में अपनी भूमिका का निर्वाह करेंगे।

चातुर्मास के अनुपम उपहार

1. गुरू पूर्णिमा – परमगुरू तीर्थंकर महावीर और शिष्य इन्द्रभूति गौतम का समवसरण सभा में मिलन ही जैन परंपरा में ‘गुरू पूर्णिमा’ है। इस दिन सभी शिष्यगण अपने परम उपकारी गुरू के उपकारों का स्मरण कर श्रद्धा भक्ति व्यक्त करते हैं।

वर्तमान में गुरू पूर्णिमा पर्व के अवसर पर श्रावक एवं श्रमण कुछ ऐसा संकल्प करें जिससे जैन समाज में वात्सल्य बढ़े और सच्चे जैनधर्म की रक्षा हो।

●श्रावक एवं विद्वान् जातिवाद, पंथवाद एवं ख्यातिलाभ के लिए पनप रहे संतवाद को बढ़ावा न देकर जिनागम पंथ के अनुसार चर्या करने वाले पीछी-कमंडलुधारी निर्ग्रंथ जिनमुद्रा की श्रद्धा-भक्ति करके अपना कर्तव्य निर्वाह करें। कदाचित् सम्यग्दर्शन का स्वयं परिचय देते हुये स्थितिकरण अंग का पालन भी करें। किंतु जिनमुद्रा का कभी अनादर या निंदा न करें।

● निर्ग्रंथ वीतरागी साधुजन मूलाचार कथित समाचार विधि का पालन करते हुये उपसंपत गुण  का परिचय दें। उपसंपत् के पाँच भेद हैं। जिसमें विनयोपसंपत् गुण का वर्णन करते आचार्य भगवन्
कहते हैं – ‘अन्य संघ से बिहार करते हुये आये मुनि को पादोष्ण या अतिथि मुनि कहते हैं। उनका विनय करना, आसन आदि देना, उनका अंगमर्दन करना, प्रिय वचन बोलना आदि।

आप किन आचार्य के शिष्य हैं? किस मार्ग से बिहार करते हुये आये हैं, ऐसा प्रश्न करना। उन्हें तृण संस्तर, फलक संस्तर, पुस्तक, पिच्छिका आदि देना, उनके अनुकूल आचरण करना तथा उन्हें संघ में स्वीकारना विनयोपसंपत है।
मूलाचार कथित विनयोपसंपत् गुण का पालन कर श्रमण संघ वात्सल्य अंग का परिचय दें जिससें ‘जीव मात्र का कल्याण हो’ ऐसा जिनोपदेश सार्थक हो सके।जो विद्वान एवं श्रमण ऐसा नहीं करते वे जिनशासन को मलिन करते हैं, कहा भी है

पण्डितैभ्र्रष्टचारित्रैर्बठरैश्च तपोधनैः।
शासनं जिनचन्द्रस्य निर्मलं मलिनीकृतम्।।

अर्थात् ‘चारित्रभ्रष्ट पण्डितों ने और बनावटी तपस्वियों ने जिनचन्द्र के निर्मल शासन को मलिन कर दिया’।

गुरू पूर्णिमा साधु मिलन का पर्व है। आओ हम सब गुरू पूर्णिमा पर्व को जिनागम पंथ के अनुसार जिनाज्ञा पालन कर सार्थक करें।

2. वीर शासन जयंती –

भगवान महावीर की समवसरण सभा में खिरनेवाली दिव्यध्वनि आज हम सभी के समक्ष ‘जिनागम-जिनवाणी’ के रूप में प्राप्त है। सभी श्रमण एवं श्रावक जिनागम वर्णित पंथ अर्थात के अनुसार चर्या करें ऐसी पूर्वाचार्य भगवंतों की आज्ञा है। यही ‘वीर शासन’ की परिपालना है। श्रावण बदी एकम् ‘वीर शासन जयंती’ के रूप में विख्यात है।

आओ हम सभी जिनागम की आज्ञा का पालन कर, जिनागम पंथ के अनुसार चर्या कर ‘वीर शासन’ के प्रति अपनी सच्ची श्रद्धा व्यक्त करें। कहा भी है –

जिनश्रुत तदाधारौ तीर्थं द्वावेव तत्त्वतः।
संसारस्तीर्यते तत्सेवी तीर्थसेवकः।।

अर्थात् ‘जिनागम और जिनागम के ज्ञाता गुरू वास्तव में दो ही तीर्थ हैं क्योंकि उन्हीं के द्वारा संसाररूपी समुद्र तिरा जाता है। उनका सेवक ही तीर्थ सेवक है।’

3. पाश्र्वनाथ निर्वाण दिवस (बैर पर क्षमा की विजय)

– चातुर्मास काल में श्रावण शुक्ल सप्तमी का दिवस मुकुट सप्तमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन तेईसवें तीर्थंकर भगवान पाश्र्वनाथ स्वामी को निर्वाण प्राप्त हुआ। आज के दिन भगवान पाश्र्वनाथ की क्षमा और कमठ के बैर का स्मरण सहज ही हो जाता है। जो प्रत्येक श्रावक और श्रमण के लिए प्रेरणादायी है। सोचें, क्षमा का फल प्राप्त करना है या बैर का। कहीं-कहीं श्रमण-श्रमण, श्रावक-श्रावक, श्रमण-श्रावक, श्रावक-श्रमण के बीच क्षमा भाव न होकर बैर भाव देखा जा रहा है। आज के दिन सोचें इसका दुष्परिणाम क्या होगा। अतः उत्तम क्षमा भाव को धारण कर पाश्र्वनाथ प्रभु की तरह उत्तम फल प्राप्ति का पुरूषार्थ करें।

4. रक्षाबंधन पर्व और आपरिग्रही साधु की पिच्छी में सोने चाँदी की राखियाँ कितनी उचित?

– जिनागम पंथ के अनुसार चर्या का पालन करने वाले आचार्य अकंपन स्वामी के संघ पर घोर उपसर्ग जान मुनि विष्णुकुमार ने अपनी श्रेष्ठ साधना के फल से प्राप्त विक्रिया ऋद्वि के द्वारा उपसर्ग दूर कर परस्पर साधु वात्सल्य का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। जो वर्तमान में श्रमण संघ एवं श्रावकों के लिए प्रेरणास्पद है।

● आज वीतरागी श्रमणों का रक्षाबंधन पर्व के वीतराग भाव को छोड़कर सरागभाव में स्थित होना आश्चर्य पैदा करता है। जब तिल-तुष मात्र परिग्रह से रहित आत्मस्वभाव में रमणता की भावना करने वाले साधुजनों के संयमोपकरण पिच्छिका में लाखों रूपयों की बोली लगाकर सोने, चांदी की राखी बांधी जाती है और साधुजन हर्ष के साथ बहिनों ने राखी बांधी ऐसे सराग भाव में जा गिरते हैं।
आशा करते हें, चातुर्मास में चतुर्विध श्रमण संघ इस ख्याति-पूजा की भावना को छोड़कर अपने वीतराग स्वभाव की रक्षा करेंगे और महा परिग्रह के बढ़ते शिथिलाचार को दूर करेंगे।

5. राष्ट्र पर्व गणतन्त्र दिवस –

प्राणी मात्र के हित की भावना से साधुजन ‘राष्ट्र के नाम संदेश’ में सदाचार का उपदेश प्रदान करें। जैसे –

1. मैं चाहता हूँ, प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के पुत्र चक्रवर्ती भरत का यह भारतदेश सदा खुशहाल, संपन्न और समृद्ध रहे।

2. भारतदेश में भौतिक समृद्धि के साथ आध्यात्मिक समृद्धि का भी सदा स्वागत हो।

3. भारत देश का हर नौजवान हिंसा को छोड़ अहिंसा में विश्वास रखे और विश्वभर में अहिंसा की अलख जगाये।

4. भारत की नारी शक्ति सीता, अंजना, चंदनवाला को आदर्श मानकर आगे बढ़े जिससे नारी, स्वाभिमान के साथ सम्मानपूर्वक जीना सीख सके।

5. भारतदेश में कभी भू्रण हत्या न हो। कन्या भू्रण हत्या विकलांग चिंतन की उपज है जो सर्वथा अनैतिक है साथ ही ब्रह्म हत्या की दोषी।

6. भारतदेश की युवाशक्ति नशीली चीजें गुटखा, शराब, सिगरेट, ड्रग्स तथा व्यसनों से दूर शाकाहार, योग तथा माता-पिता की सेवा को कर्तव्य समझें।

7. भारतदेश का प्रत्येक वर्ग साधु, शिक्षक, राजनेता, सैनिक, पुलिस, छात्र-छात्राएँ एवं सामाजिक संगठन सभी कर्तव्यनिष्ठ बनें और अपनी मर्यादा में रहते हुये कर्व्तय पालन करें।

8. भारतदेश का नागरिक समृद्ध बने। शादी में धन का अपव्यय न करें, शादी में लाखों का खर्च, किसी चिकित्सा, शिक्षा, सामाजिक-धार्मिक क्षेत्र में लगाकर खुशियाँ चिर स्थायी करें। इत्यादि।

6. दशलक्षण पर्व –

चातुर्मास में दशलक्षण पर्व का विशिष्ट महत्व है। श्रमण संघ दस धर्मों की व्याख्या कर श्रावकों को जिनागम पंथ अनुसार धर्मपूर्वक जीने की कला सिखाते हैं। सांस्कृतिक गतिविधियों के द्वारा आबाल-वृद्ध अपना विकास करते हैं एवं धर्म की महत्ता से परिचित होते हैं। दशलक्षण धर्म आत्मोत्कर्ष के सोपान है।

7. क्षमावाणी पर्व –
(प्रवचन क्षमावाणी का आचरण में वैरभाव कितना उचित?)

दशलक्षण धर्म का पालन करने वाले श्रमण एवं श्रावक वर्ग क्षमावाणी पर्व के माध्यम से जीवमात्र से क्षमायाचना कर आत्मा को शुद्ध करते हैं। आज के दिन एकेन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय पर्यन्त जीवों से सरलभाव से अपने ज्ञात-अज्ञात दोषों के प्रति क्षमाभाव अनुभवकर निर्दोष आत्मा बनाते हैं।

● चातुर्मास में श्रमण संघ एवं श्रावकगण सब भेदभाव त्यागकर एक मंच पर आसीन हो क्षमावाणी आत्मा से मनायें। कहीं ऐसा न हो कि उत्तम क्षमाधर्म के पालक साधु एक मंच पर आने से ही मना कर दें और क्षमावाणी पर्व एक कोरा अभिनय मात्र बनके रह जाये। प्रवचन क्षमावाणी के और आचरण बैरभाव का। जिनमुद्राधारी साधु जरूर ही क्षमावाणी पर्व को निष्कषाय भाव से मनायेंगे ऐसी आशा करते हैं।

8. धनतेरस एंव दीपावली पर्व –

चतुर्विध संघ एवं सद् गृहस्थ श्रावक इन दिनों में भगवान महावीर के संसार मुक्ति फल का चिंतन कर सद्मार्ग – मोक्षमार्ग को सफल करने की भावना करें। भगवान महावीर परिनिर्वाण दिवस हमें संसार में रागद्वेष के बंधनों से छूटकर वीतराग भाव में स्थित हो पूर्ण आत्मस्वभाव की प्राप्ति की प्रेरणा देता है।

चातुर्मास के मध्य में अन्य सम्यक् धर्म प्रभावना के आयोजन आयोजित कर जिनशासन का गौरव बढ़ाये। सद्गृहस्थ श्रावक, श्रमण संघ के सानिध्य में जिनदेव-जिनागम-जिनमुद्राधारी गुरू के प्रति श्रद्धावान बनें। श्रमण संघ वात्सल्यभाव से मिलें और सम्यग्दर्शन के आठ अंग आचरण में आयें तभी चातुर्मास के विशिष्ट क्षण अभिनंदनीय हो सकते हैं और भगवान महावीर के शासन की निर्मल प्रभावना सर्वत्र गुंजायमान हो सकती है।

आओ, इस चातुर्मास में हम सभी श्रमण संघ जिनागम पंथ चर्या कर जिनशासन के गौरव को बढ़ाये और ऋण मुक्त हों।

“जयदु जिणागम पंथो”
जिनागम पंथ जयवंत हो

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