मानवता के मसीहा

Feature

भगवान महावीर व आचार्य प्रसन्नसागर

महावीर दीपचंद ठोले,

दुनिया में दो तरह के महापुरुष हुए हैं, एक वे जिन्होंने संसार को महान विचार दिये जो चिंतक, विचारक और दार्शनिक कहलाते हैं। दूसरे वे जिन्होंने संसार को महान जीवन दिया, जीवन जीने की कला सिखलाई, वे ‘मानवता के मसीहा’ बन जाते हैं। भगवान महावीर का जीवन तो महान विचारों का क्रियान्वय है और महान जीवन का उदाहरण भी। ऐसा अद्भुत समन्दय और अभिनव संगम दुर्लभ है। ऐसा ही जीवन और विचार देने वाल व्यक्तित्व हमें आचार्य प्रसन्नसागरजी मंे भी देखने को मिलता है। यह दोनों महापुरूष मानवता के मसीहा ही कहलाएंगे।

ही कहलाएंगे।

भगवान महावीर अमृत पुरूष हैं, जिन्होंने मनुष्य को केवल व्यक्तव्य, कोरे उपदेश नहीं दिए अपितु उनका समग्र जीवन हमारे लिए महान संदेश है। महावीर प्रयोगध्र्मी थे। उन्होेंने स्वयं अपने आप पर प्रयोग किया, जिसमें वे सपफल और विजयी हुए। आज 2550 वर्ष पश्चात भी वे हमारे लिए प्रासंगिक हैं। उनकी अपनी जीवन दृष्टि है। उनके सारे सि(ांत जीवन सापेक्ष हैं।
उन्होंने सत्य का सि(ांत दिया ताकि व्यक्ति झूठ प्रपंच और प्रवंचना से समाज और स्वयं को मुक्त कर सके। हर व्यक्ति अपने लिए पूरे तरह से सुरक्षा की भावना रखे। जिसके लिए महावीर ने अचैर्य का सि(ांत दिया। उन्होंने अहिंसा का सि(ांत दिया, ताकि हर किसी को जीने का पूरापूरा अध्किार मिल सके। स्वयं भी जियो और दूसरों को भी जीने दो भगवान महावीर में अपरिग्रह का भी सि(ांत दिया कि समाज में साम्यवाद की स्थापना हो और समाज में हर व्यक्ति को जीने के साथ-साथ सुख-साधनों का समानाधिकार उसको उपलब्ध् हो सके। ब्रम्हचर्य का भी सि(ांत उन्होंने दिया ताकि हर नारी स्वयं को सुरक्षित अनुभव के कोई भी व्यक्ति अनिर्मल-अपवित्रा दृश्ट गुजरे जीवन में सदाचार और सद्विचारों की गंगा सदा बहती रहें। उनका हर सि(ांत जीवन सापेक्ष है। उनकी जीवन दृष्टि पूरी तरह से जीवन उत्थान से जुडी है महावीर कहते है कि सहि देखो, सुंदर देखो खुली आंखों से देखो, अंतर की आंखों से देखी जिसे ‘सम्यक दर्शन’ कहते हैं। सदा सहिद सुंदर जानी, जिसे ‘‘सम्यक ज्ञान‘‘ कहा है। सदा सहि व सुंदर करों कोई भी कार्य हम से कलंकित न हो। जो भी करो वह हमारे यश और गुणों में वृ(ि करने वाले हो जिसे ‘सम्यक चारित्र‘ कहा है यह तीन्ही गुण उपदेश हमारे जीवन को मंगलमय सृजनात्मक और रचनात्मक बनाने के लिए प्रयास है।

भगवान महावीर मौलिक थे। वे शास्त्रीय नहीं वैज्ञानिक थे वे सि(ांतवादी नहीं व्यावहारिक थे। वे स्वप्नवादी नही यर्थाथवादी थे। वे एकांतवादी नही अनेकांत वादी थे। वे मानवतावादी नहीं प्राणीवादी थे क्योंकि वे कहते थे पृथ्वी पर मेरा सभी प्राणीयों से मैत्रीभाव है। वे सर्वोदयी थी। उन्होंने सर्वोदय तीर्थ की स्थापना की इसीलिए अहिंसा को धर्म कहा है। वे नियमवादी नहीं बोधवादी थे ये हिंसावादी नहीं, अहिंसावादी थे। वे कहते थे कि आपके हृदय की धड़कन में प्रमे हो, रोम-रोम में करुणा भरी ही हमारा जीवन एवं दूसरी के लिए मंगलकारी हो इसलिए भगवान महावीर कभी के लिए नहीं अभी के लिए और सभी के लिए है।

आज विश्व को महावीर के सि(ांतों की पुर्नप्रतिष्ठा की प्रथल आवश्यकता है क्योंकि आज के वैज्ञानिक और प्रगतीशिल युग में विश्व स्वार्थ, हिंसा और दुराग्रहों के दौर से गुजर रहा है. ऐसे समय महावीर पिफर से आवश्यक हो चुके हैं। ऐसा लगता है कि इस धरती पर पुनः महावीर का पुनर्जन्म हो, जो की असंभव है परंतु इतिहास गवाह है, जब जय पृथ्वी पर अत्याचार, अनाचार, दुराचार, शोषण, हिंसा विद्वेष कुरीतियां बढ़ी है तब तब इस धरती पर दिव्य आत्माओं ने अवतार लेकर समाज में व्याप्त समस्त बुराईयों को दूर किया और पीडित दलित मानवता की सेवा की जैसे 2550 वर्ष पूर्व भ. महावीर का अवतरण इस धरती पर मानव जाति के जीवन में अमूलचुल बदलाव लाने हेतु हुआ था उसी प्रकार 52 वर्ष पूर्व 23 जुलाई 1960 को दिलीपकुमार के रूप में अंतरमैना आ. प्रसन्नसागरजी इस ध्रती पर मानवता के मसीहा के रूप में अवतरीत हुए, जिन्होंने 19 अप्रैल 1986 को भगवान महावीर जयंती के पावन अवसर पर ही जैनध्र्म की सर्वोच्च जैनश्वरी दीक्षा धरणकर मानवजाति के उत्थान और कल्याण हेतु अपनी साध्ना कर रहे हैं। जैसे महावीर के पास उनकी साध्ना के प्राप्त सत्य और जीवन में उपार्जित होने वाली आध्यात्मिक ने मत और वैभव है, उनकी मौलिक संपदा है जैसे ही आचार्य प्रसन्नसागरजी की साधन और वर्ग की शब्दातीत है, ज्यों महावीर जैसे ही अल्पायु में जिनध्र्म का ही नहीं अपितु मानवता का झंडा सारे विश्व में पफहरा रहे हैं और अध्यात्म के आकाश में सूर्य बनकर चमक रहे हैं। तब ऐसा लगता है कि. जिनकी चर्चा में आतंत्रा हुआ करते हैं, जिनकी वाणी में महामंत्रा हुआ करते हैं। इस युग में महावीर नहीं तो क्या गम है, आचार्य श्री प्रसन्नसागरजी क्या महावीर से कम है। आचार्य श्री ने कठिनतम जन् पंचमकाल में अपना नाम जैन इतिहास के पृष्ठ पर स्वर्गीकित किया है। आपने अखण्ड मौन में उपवास रखकर विज्ञान को भी चुनौति दी है सि( कर दिया है कि विज्ञान सर्वोपरि नहीं, धर्म सर्वोपरि है और धर्म के आगे विज्ञान बोना है। जैन धर्म का यह एक रहस्य है कि जिसके आगे विज्ञान ने घुटने टेक दिए है। सच तो यह है कि विज्ञान के सामने सारी दुनिया झुकती है पर आ सागरजी ने विज्ञान को भी धर्म के आगे झुका दिया। विज्ञान कहता है कि 10/12 दिन यदि मुनष्य को भोजन या पर्याप्त कैलरी नहीं मिली तो उसकी मृत्यु होने संभावना है परंतु हमारे आचार्य श्री ने 166 दिन के मौन में 183 दिन के उपवास रखकर कीर्तिमान स्थापित किया है। भगवान महावीर के पश्चात ऐसी करने वाले मात्रा आचार्य श्री ही है। ऐसे तपस्वियों को लक्ष्यकर कर ही प्रतीत होता है कि कुंद स्वामी ने आज भी रत्नत्राय चारियों के लोकान्तक दे इन्वरूप में उत्पन्न होने की बात कही है। जहां से जीव नियमतः निर्वाण को प्राप्त करता है अंतर्मना आचार्य श्री ने तपसा निर्जरा सूत्रा को हृदयगम करके उत्कृष्ट तप के द्वारा अपने कर्मों की जो निर्जरा कर रहे है भविष्य में उनके घातियां कर्मों का नाश करके केवल ज्ञान में निश्चय ही सहायक बनेंगी।

आचार्य श्री के उपदेश हमेशा जीवन समस्याओं, गहनतमतियों के मर्म का संस्पर्श करते हैं। जीवन को उसकी में जानने व समझने की कला से परिचित कराते हैं। आपके समी तेजस्वी जीवन को शब्दों के परिधि में बना है। चितफलक देश, काल, संप्रदाय, जाति-धर्म संपूर्ण प्राणीमात्रा को समाहित करता है। नैतिक जीवन जीने की प्रेरणा देता है। भगवान महावीर के एवं आचार्य श्री प्रसन्नसागरजी के जीवन में ऐसी अनेक साम्यता देखने को मिलती है। भगवान महावीर ने न कोई पथ बनाया न संप्रदाय न कोई ग्रंथ रचे ना कोई परम्पराएं बनाई न किसी गुरुकुल या आश्रम में अध्ययन किया। वे अपने आपसे जीतते गये और जिन कहलाए और अपने पुरुषार्थ के बलकर परमात्मापद को प्राप्त किया जो हर कोई व्यक्ति पुरुषार्थ करकर प्राप्त कर सकता है। ऐसे ही आचार्य श्री जो भगवान महावीर के ही लघुनंदन है वे भी भगवान महावीर के ही पदचिन्हों पर चलकर मोक्षमार्ग को प्रशस्त कर रहे। आप ने भी मात्रा 5वीं कक्षा तक ही पढ़ाई की है। आपने भी कोई बनाया ना कोई संप्रदाय न कोई निर्माण। आप आज जो भी है वह आपके पूर्व की भव की पुण्याई का ही पफल हैं पुण्याई का ही पफल है। आज भगवान महावीर जयंती के पावन दिन आपका दिन है अवसर पर इस मानवता के मसीहा को मैं विनयांजली अर्पित करते हुए भावना भाता हूँ कि आप स्वकल्याण करते रहे। और धर्म साधना करते अगली में तीर्थंकर के रूप में अवतरीत हो और इस धरातल पर फिर से महावीर साकार हो, जो इस सृष्टि का कल्याण करें, संरक्षण करें..

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