आदिपुरुष श्री रिषभदेव भगवान

Feature

इस अवसर्पिणी काल के तीसरे भाग के अन्त में प्रथम तीर्थकर वृषभदेव का जन्म हुआ। देवों और मनुष्यों ने मिलकर उत्सव मनाया। वे जन्म से ही अवध्ज्ञिानी थे, उन्हें ज्ञान के लिए किसी निर्देश की आवश्यकता नहीं थी। उनमें सभी सदगुण विद्यमान थे। कच्छ और महाकच्छ की दो बहनें थीं, वृषभदेव को विवाही गई। यशस्वती ;नदीद्ध और सुनन्दा उनका नाम था। यशस्वती से भरतादि सौ पुत्रा तथा ब्राह्मी नामक पुत्राी हुई। सुनन्दा से वृषभदेव के एक पुत्रा और पुत्राी युगल रूप में हुए, पुत्रा बाहुबली और पुत्राी का नाम सुंदरी था। बाहुबली इस युग के पहले कामदेव थे, निपुणता में उनका कोई प्रतिद्वन्दी नहीं था।

वृषभ देव सम्पूर्ण साम्राज्य पद भरत चक्रवर्ती को देकर तपोवन को जाने के लिए उद्यत हुए तब ब्राह्मी-सुंदरी दोनों बहनें आकर पिताजी से निवेदन करने लगीं कि पिताजी! भाई भरत को तथा बाहुबली को तो आपने बहुत कुछ दिया परन्तु हमें कुछ नहीं दिया? तब भगवान ने कहा कि बेटियों! तुम्हें क्या चाहिए? इस तरह भगवान की प्रश्न करने की आदत थी। क्योंकि भगवान के अंदर लोभ कषाय की मन्दता थी तथा उनके अंदर दान करने की प्रवृति होने के कारण इनके प्रति शंकात्मक उत्तर मिलता था। पिताजी की इस बात से प्रसन्न होकर दोनो पुत्रियाँ लौकिक सम्पत्ति पूछना तो भूल ही गईं पर परलोक के कल्याण निमित्त तथा भविष्य में सर्वजनता के कल्याणार्थ उन दोनों ने इस प्रकार प्रार्थना की कि – पिताजी! अभी भरतादि भाईयों को आपने जो सम्पत्ति दिया है वह सब क्षणभंगुर तथा दुःखदायी है, हमें ऐसी वस्तु नहीं चाहिए। हमें आप कोई ऐसी वस्तु दो कि जो सदा हमारे साथ रहे।
तब भगवान ने प्रसन्नतापूर्वक दोनों पुत्रियों को अपने पास बुलाकर बाँये अंग में बाह्मी को और दाहिनी अंग में, सुन्दरी को बिठा लिया। भगवान ने अपने दाहिने हाथ के अगुंठे को अंदर रखकर मुट्ठी बांध्कर ब्राह्मी की हथेली में बंध्े हुए अमृतमय अपने अंगूठे से लिख दिया। क्योंकि भगवान का जन्म हुआ था तब बालक अवस्था में सौध्र्म इन्द्र ने भगवान के अंगूठे के समान भूल भाग में अमृत भर दिया था। उस अमृत को उनके अंगूठे के मूलस्थान से लेकर सिंदन करते हुए सर्वभाषामयी अक्षरों को लिखकर कहा कि बेटी आपके प्रश्न के कारण अक्षर की उत्पत्ति हुई है। और अनंतकाल तक रहेगी। इसलिए ये अक्षर साध्य अनंन्त कहलाते हैं। भोग भूमि में इसकी आवश्यकता नहीं थी और कर्म भूमि की अपेक्षा से ये अक्षर अनाद्यनन्त भी कहे जाएंगे। छठवें काल में ये अक्षर काम में नहीं आने से सान्त भी हैं। तभी से सभी विद्वानों का यही मत है कि सभी लिपियों की अपेक्षा ब्राम्ही लिपि प्राचीन है। क्योंकि यह, लिपि आदि तीर्थकर श्री वृषभदेव की सुपुत्राी ब्राह्मी के नाम से अंकित है।

ब्राह्मी देवी भगवान की बाँई जंघा पर बैठी हुई थी और सुंदरी दाहिनी जंघा पर। अतः ब्राह्मी के हाथ में भगवान ने अपने दायें हाथ से लिखा और सुंदरी के हाथ में बायें हाथ से लिखने की आवश्यकता पड़ी। इसी कारण बायें से दायीं ओर वर्णमाला लिपि तथा दायें से बायीं ओर अंकमाला लिपि प्रचलित हुई। कहा भी है- अंकानां वाम तोगतिः भगवान वृषभदेव ने अंक बनाने की विध् िबताकर कहा कि सुन्दरी तुम अपनी बहन ब्राह्मी के हाथ में 64 वर्णमाला को देखकर यह चिन्ता मत करो कि इनके हाथ में अध्कि और हमारे हाथ में अल्प है। क्योंकि ये 64 वर्ण 9 के अन्तर्गत ही हैं। इस 9 के अन्तर्गत ही समस्त द्वादशांग वाणी हैं। यह बात सुनते ही सुंदरी देवी संतुष्ट हुई।
कोकिला विमल जैन ;पहाड़ियाद्ध

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *