वैज्ञानिक डाॅक्टर विक्रम साराभाई

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विद्यावाचस्पति डाॅ. अरविन्द प्रेमचंद जैन
विक्रम अंबालाल साराभाई भारत के प्रमुख वैज्ञानिक थे। इन्होंने 86 वैज्ञानिक शोध् पत्रा लिखे एवं 40 संस्थान खोले। इनको विज्ञान एवं अभियांत्रिकी के क्षेत्रा में सन 1966 में भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। डाॅ. विक्रम साराभाई के नाम को भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम से अलग नहीं किया जा सकता। यह जगप्रसि( है कि वह विक्रम साराभाई ही थे जिन्होंने अंतरिक्ष अनुसंधन के क्षेत्रा में भारत को अंतर्राष्ट्रीय मानचित्रा पर स्थान दिलाया। लेकिन इसके साथ-साथ उन्होंने अन्य क्षेत्रों जैसे वस्त्रा, भेषज, आणविक ऊर्जा, इलेक्ट्रानिक्स और अन्य अनेक क्षेत्रों में भी बराबर का योगदान किया।

प्रारंभिक जीवनः

विक्रम साराभाई का जन्म 12 अगस्त 1919 को गुजरात, भारत के अहमदाबाद शहर के जिन परिवार में हुआ था। साराभाई के परिवार का उनके जीवन में बहुत महत्त्व था और वे एक अमीर व्यापारी परिवार से सम्बन्ध्रखते थे। उनके पिता अम्बालाल साराभाई एक स्मृ( उद्योगपति थे जिन्होंने गुजरात में कई मिल्स अपने नाम कर रखी थी। विक्रम साराभाई, अम्बालाल और सरला देवी की 8 संतानो में से एक थे। अपने 8 बच्चों को पढ़ाने के लिए सरला देवी ने मोंटेसरी प्रथाआंे के अनुसार एक प्राइवेट स्कूल की स्थापना की, जिसे मारिया मोंटेसरी ने प्रतिपादित किया था, उनकी इस स्कूल ने बाद में कापफी ख्याति प्राप्त की थी।
साराभाई का परिवार भारतीय स्वतंत्राता अभियान में शामिल होने के कारण बहुत से स्वतंत्राता सेनानी जैसे महात्मा गांध्ी, मोतीलाल नेहरू, रवीन्द्रनाथ टैगोर और जवाहरलाल नेहरू अक्सर साराभाई के घर आते-जाते रहते थे। इन सभी सेनानियांे का उस समय युवा विक्रम साराभाई के जीवन पर कापफी प्रभाव पड़ा और उन्होंने साराभाई के व्यक्तिगत जीवन के विकास में कापफी सहायता भी की।

सितम्बर 1942 को विक्रम साराभाई का विवाह प्रसि( क्लासिकल डांसर मृणालिनी साराभाई से हुआ। उनका वैवाहिक समारोह चेन्नई में आयोजित किया गया था जिसमंे विक्रम के परिवार से कोई उपस्थित नहीं था, क्योंकि उस समय महात्मा गांध्ी का भारत छोड़ो आंदोलन चरम पर था, जिसमें विक्रम का परिवार भी शामिल था। विक्रम और मृणालिनी को दो बच्चे हुये- कार्तिकेय साराभाई और मल्लिका साराभाई। मल्लिका साराभाई अपने आप में ही एक प्रसि( डांसर है जिन्हें पालमे डी’ओरे पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

डा. साराभाई के व्यक्तित्व का सर्वाध्कि उल्लेखनीय पहलू उनकी रूचि की सीमा और विस्तार तथा ऐसे तौर-तरीके थे जिनमें उन्होंने अपने विचारों को संस्थाओं में परिवर्तित किया। सृजनशील वैज्ञानिक, सपफल और दूरदर्शी उद्योगपति, उच्च कोटि के प्रवर्तक, महान संस्था निर्माता, अलग किस्म के शिक्षाविद, कला पारखी, सामाजिक परिवर्तन के ठेकेदार, अग्रणी प्रबंध् प्रशिक्षक आदि जैसी अनेक विशेषताएं उनके व्यक्तित्व में समाहित थीं।

उनकी सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि वे एक ऐसे उच्च कोटि के इन्सान थे जिसके मन में दूसरों के प्रति असाधरण सहानुभूति थी। वह एक ऐसे व्यक्ति थे कि जो भी उनके संपर्क में आता, उनसे प्रभावित हुए बिना न रहता। वे जिनके साथ भी बातचीत करते, उनके साथ पफौरी तौर पर व्यक्तिगत सौहार्द स्थापित कर लेते थे। ऐसा इसलिए संभव हो पाता था क्योंकि वे लोगों के हृदय में अपने लिए आदर और विश्वास की जगह बना लेते थे और उन पर अपनी ईमानदारी की छाप छोड़ जाते थे।

विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र इसरो का सबसे बड़ा एवं सर्वाध्कि महत्वपूर्ण केंद्र है। यह तिरुवनंतपुरम में स्थित है। यहाँ पर राॅकेट, प्रक्षेपण यान एवं कृत्रिम उपग्रहों का निर्माण एवं उनसे सम्बंध्ति तकनीकी का विकास किया जाता है। केंद्र की शुरुआत थम्बा भूमध्यरेखीय राॅकेट प्रक्षेपण केंद्र के तौर पर 1962 में हुई थी। केंद्र का पुनः नामकरण भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डाॅ विक्रम साराभाई के सम्मान में किया गया।

  • डाॅ. साराभाई द्वारा स्थापित संस्थान:
  • भौतिक अनुसंधन प्रयोगशाला ;पीआरएलद्ध, अहमदाबाद
  • इंडियन इंस्टीट्यूट आॅपफ मैनेजमेंट ;आईआईएमद्ध, अहमदाबाद
  • कम्यूनिटी साइंस सेंटर, अहमदाबाद
  • दर्पण अकाडेमी पफाॅर परपफार्मिंग आर्ट्स, अहमदाबाद ;अपनी पत्नी के साथ मिल करद्ध
  • विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र, तिरुवनंतपुरम
  • स्पेस अप्लीकेशन्स सेंटर, अहमदाबाद ;यह संस्थान साराभाई द्वारा स्थापित छह संस्थानों/केंद्रों के विलय के बाद अस्तित्व में आयाद्ध
  • पफास्टर ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर ;एपफबीटीआरद्ध, कल्पकम
  • वेरिएबल एनर्जी साइक्लोट्राॅन प्राॅजेक्ट, कोलकाता
  • इलेक्ट्राॅनिक्स काॅर्पोरेशन आॅपफ इंडिया लिमिटेड ;ईसीआईएलद्ध, हैदराबाद
  • यूरेनियम कार्पोरेशन आॅपफ इंडिया लिमिटेड ;यूसीआईएलद्ध, जादूगुडा, बिहार

भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रमः

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधन संगठन ;इसरोद्ध की स्थापना उनकी महान उपलब्ध्यिों में एक थी। रूसी स्पुतनिक के प्रमोचन के बाद उन्होंने भारत जैसे विकासशील देश के लिए अंतरिक्ष कार्यक्रम के महत्व के बारे में सरकार को राजी किया। डाॅ. साराभाई ने अपने उरण में अंतरिक्ष कार्यक्रम के महत्व पर जोर दिया. ‘‘ऐसे कुछ लोग हैं जो विकासशील राष्ट्रों में अंतरिक्ष गतिविध्यिों की प्रासंगिकता पर सवाल उठाते हैं। हमारे सामने उद्देश्य की कोई अस्पष्टता नहीं है।
हम चंद्रमा या ग्रहों की गवेषणा या मानव सहित अंतरिक्ष-उड़ानों में आर्थिक रूप से उन्नत राष्ट्रों के साथ प्रतिस्पर्ध की कोई कल्पना नहीं कर रहें हैं।’’ ‘‘लेकिन हम आश्वस्त हैं कि अगर हमें राष्ट्रीय स्तर पर, और राष्ट्रों के समुदाय में कोई सार्थक भूमिका निभानी है, तो हमें मानव और समाज की वास्तविक समस्याओं के लिए उन्नत प्रौद्योगिकियों को लागू करने में किसी से पीछे नहीं रहना चाहिए।’’

विज्ञान के क्षेत्रा में उनकी उपलब्ध्यिों को देखते हुए 1962 में उन्हें ‘शांतिस्वरूप भटनागर पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। भारत सरकार ने उन्हें 1966 में ‘पद्मभूषण’ से अलंकृत किया। इन सबके अतिरिक्त इंडियन अकादमी आॅपफ साइंसेज, नेशनल इंस्टीटयूट आॅपफ साइंसेस आॅपफ इंडिया, पिफजिकल सोसाइटी, लन्दन और कैम्ब्रिज पिफलोसापिफकल सोसाइटी ने उन्हें अपना ‘पफैलो’ बनाकर सम्मानित किया।
डाॅ. साराभाई जब वापस अपने स्वतंत्रा भारत में आए तो उन्होंने उन सुविधओं को लाने या उसकी पूर्ति करना चाहा था जो अभी लोगो के बीच नहीं था, इसके लिए उन्होंने अपने परिवार द्वारा चलाए जा रहे समाजसेवी संस्थानों को चलाना आरम्भ कर दिया एवं नवम्बर 11, 1947 को कर्मक्षेत्रा एजुकेशनल पफाउंडेशन और दा अहमदाबाद एजुकेशन सोसाइटी की मदद से भौतिक अनुसंधन प्रयोगशाला की स्थापना की एवं अपने संस्थान में नए चीजो की खोज आरम्भ कर दिया और इस संस्थान में इन्होने काॅस्मिक रे और प्राॅपर्टीज आॅपफ दा उप्पेर लेयर आपफ अट्माॅस्पफेरे के बारे में अध्ययन आरम्भ किया।
रोचक तथ्यः

इस महान वैज्ञानिक के सम्मान में तिरूवनंतपुरम में स्थापित थुम्बा इक्वेटोरियल राॅकेट लाँचिंग स्टेशन और सम्ब( अंतरिक्ष संस्थाओं का नाम बदल कर विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केन्द्र रख दिया गया।
उनके पिता अंबालाल साराभाई एक संपन्न उद्योगपति थे।
भारत में इंटरमीडिएट विज्ञान की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद विक्रम साराभाई इंग्लैंड चले गये और ‘केम्ब्रिज विश्वविद्यालय’ के सेंट जाॅन काॅलेज में भर्ती हुए।

अहमदाबाद में ‘भौतिक अनुसंधन प्रयोगशाला’ की स्थापना में उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
‘भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधन संगठन’ की स्थापना विक्रम साराभाई की महान उपलब्ध्यिों में एक थी।
इनको विज्ञान एवं अभियांत्रिकी के क्षेत्रा में सन 1966 में भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।
विक्रम साराभाई को सन 1966 में पद्म भूषण एवम 1972 में पद्म विभूषण से नवाजा गया था।
थिरुवनंतपुरम के थुम्बा स्थित पहला राकेट लाॅन्चिंग स्टेशन डा . होमी जहांगीर भाभा और साराभाई के सहायता से स्थापित किया गया था।

इनकी शादी एक प्रसि( क्लासिकल डांसर मृणालिनी से हुआ और इनकी शादी में इनके कोई भी पफैमिली मेंबर नहीं थे।
विक्रम साराभाई ने कास्मिक किरणों के समय परिवर्तन पर अनुसंधन किया और निष्कर्ष किया कि मौसम विज्ञान परिणाम कास्मिक किरण के दैनिक परिवर्तन प्रेक्षण पर पूर्ण रुप से प्रभावित नहीं होगा। आगे, बताया कि अवशिष्ट परिवर्तन विस्तृत तथा विश्वव्यापी है तथा यह सौर क्रियाकलापों के परिवर्तन से संबंध्ति है। विक्रम साराभाई ने सौर तथा अंतरग्रहीय भौतिकी में अनुसंधन के नए क्षेत्रों के सुअवसरों की कल्पना की थी। वर्ष 1957-1958 को अंतर्राष्ट्रीय भू-भौतिकी वर्ष के रुप में देखा जाता है।
साराभाई द्वारा प्ळॅ के लिए भारतीय कार्यक्रम एक अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा। 1957 में स्पुटनिक-1 के प्रमोचन ने उनको अंतरिक्ष विज्ञान के नये परिदृश्यों से अवगत कराया। तदनंतर, उनकी अध्यक्षता में अंतरिक्ष अनुसंधन हेतु भारतीय राष्ट्रीय समिति ;प्छब्व्ैच्।त्द्ध का गठन किया गया। थुम्बा का विशेष नक्शा कि वह भू-चुबंकीय मध्यरेखा के निकट है को देखते हुए विक्रम साराभाई ने तिरुअनंतपुरम के पास अरबी तट पर स्थित एक मछुवाही गांव थुम्बा में देश के प्रथम राकेट प्रमोचन स्टेशन, थुम्बा भू-मध्य रेखीय राकेट प्रमोचन स्टेशन ;ज्म्त्स्ैद्ध की स्थापना का चयन किया।
इस साहस में, उनको होमी भाभा जो उस समय परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष थे से सक्रिय सहयोग मिला था। नवंबर 21, 1963 को सोडियम वाष्प नीतभार के साथ प्रथम राकेट का प्रमोचन किया गया। संयुक्त राष्ट्र महा सभा ने 1965 में, ज्म्त्स्ै को एक अंतर्राष्ट्रीय सुविध के रुप में मान्यता दी।

मृत्युः

भारत में अंतरिक्ष कार्यक्रमों के जनक इस महान वैज्ञानिक की 30 दिसंबर 1971 को मृत्यु हो गई, किन्तु उनके बताए रास्तों पर चलते हुए भारतीय वैज्ञानिक 1975 ई. में स्वदेश में निर्मित प्रथम उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ को अंतरिक्ष में भेजने में कामयाब रहे। अंतरिक्ष उपग्रहों के कारण ही ग्रामीण क्षेत्रों में टेलीविजन प्रसारण द्वारा शिक्षा, कृषि एवं ग्रामीण विकास में मदद मिल रही है तथा मौसम पूर्वानुमान से देश के गरीब किसानों को लाभ हो रहा है। डा. साराभाई के व्यक्तित्व का सर्वाध्कि उल्लेखनीय पहलू उनकी रुचि की सीमा और विस्तार तथा ऐसे तौर-तरीके थे, जिनके बल पर वे अपने विचारों को संस्थाओं में परिवर्तित करने में कामयाब हुए।

उन्हें सृजनशील वैज्ञानिक के अतिरिक्त यदि सपफल और दूरदर्शी उद्योगपति, उच्च कोटि का प्रवर्तक, महान संस्था निर्माता, शिक्षाविद, कला मर्मज्ञ, अग्रणी प्रबंध् आचार्य जैसे विशेषणों से सुशोभित किया जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। वे आज सशरीर हमारे बीच भले ही न हों, परंतु वस्त्रा उद्योग, औषध् िनिर्माण, परमाणु ऊर्जा, भौतिक विज्ञान इत्यादि के क्षेत्रा में उनके योगदान को भारत कभी नहीं भुला सकता। डा. साराभाई का जीवन विश्व भर के युवा-वैज्ञानिकों के लिए प्रेरणा का अनमोल स्रोत है।

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