अन्याय से धन कमाने की अपेक्षा दरिद्र रहना अच्छा

Event

विद्यावाचस्पति डाॅ. अरविन्द प्रेमचंद जैन
अन्याय से ध्न कमाने की अपेक्षा दरिद्री रहना अच्छा है। वर्षा के जल से कभी नदी में बाढ़ नहीं आती जब तक की उसमंे नाले और नालियों का पानी न मिले। मनुष्य भौतिक सुविधओं के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता है। उसे बाह्य सामग्री में सुख मिलता हैं और उनमंे ही उसे अपनी आत्मा प्रतीत होती है और उसके लिए दिन रात बैचैन रहता है। ध्न कमाने में कष्ट, सुरक्षा करने में कष्ट, नष्ट होने पर दुःख पर जब व्यक्ति ध्न का अँध होता है तब उसे कुछ नहीं सुहाता या पसंद करता है।

मानव स्वभाव की सबसे बड़ी दुर्बलता है वह हर क्षेत्रा में असीमित रहना चाहता है चाहे खाने पीने, ध्न, दौलत, काम वासना। वह दिन रात इसी में व्यस्त रहता है। ध्न हमेशा अपने पुण्य से मिलता है। कभी कभी कोई कहता है कि मैं बहुत ईमानदार हूँ पर मेरे पास ध्न की कमी रहती है और वह व्यक्ति दिन रात चोरी करता है, ठगी करता है और उसके पास बहुत ध्न की वर्षा हो रही है। और ध्नाढ्य है। इस पर एक बात ध्यान रखना चाहिए की उस व्यक्ति का अभी पुण्य का उदय है इसलिए उसे ध्न प्राप्ति हुई हैं। जैसे कोई व्यक्ति जितना भी बैंक में जमा करेगा वह उसमें से ही आहरण करेगा। जिसके खाते में ध्न नहीं है तो वह क्या आहरण करेगा। जिसने पूर्व जन्म में दान नहीं दिया, किसी की मदद नहीं की तो इस जन्म में उसे ध्नाभाव रहेगा। यदि वह व्यक्ति पुरुषार्थ करे तो इस जन्म के साथ अगले भव में भी लाभ मिलेगा।

विपचचा सम्पदे हि स्यादभाग्यम यदि पचेलिमम (छत्राचूड़ामणि 8/93द्ध)
यदि पुण्य का उदय हो तो विपत्ति भी सम्पत्ति का कारण बन जाती है।

जो व्यक्ति अपने वर्तमान से असंतुष्ट होने के बाद और अध्कि ध्नवान बनने का प्रयास करता है, यदि उसके भाग्य में होगा तो जरूर बनेगा यदि वह नीति से ध्नोपार्जन करेगा अन्यथा जो कमा गया है वह भी नष्ट हो जाएगा या हो जाता है। अन्याय ध्नीति का ध्न दस वर्ष तक पफलता पफूलता है और ग्यारहवे वर्ष वह मूल से चला जाता है।

जैसे कोई दुबला मनुष्य मोटा होने के लिए शरीर में सूजन चढ़ा ले उससे वह दुबला अच्छा।
मानव को ईश्वर ने पेट भरने भरपूर अन्न और सीमित संसाध्न दिए हैं पर असीमित चाहत को पूर्ण करने की किसी में ताकत नहीं। क्योकि हर व्यक्ति असीमित चाहत रखता है, साध्न सीमित हैं। पेट में जगह सीमित होती हैं पर पेटी असीमित होती हैं।

ध्न को दौलत कहते हैं जब आती है तो सीना में लात मारती है उससे अकड़ आती है और जब जाती है तो वह कमर में एक लात मारती जिससे उसकी कूबड़ निकल आती है। इसलिए ध्नवान व्यक्ति इन कारणों से दुखी होते हैं —

ईष्र्या घृणी त्वसन्तुष्टसक्रोध्ी नित्यशंकिताः
परभाग्योपजीवी च षडेते दुखभागिनः

जो ईष्र्या व घृणा रूप भाव रखता हो, संतोषी न हो, अतिक्रोध्ी हो, सदैव शंकित रहे तथा दूसरों के भाग्य के सहारे जीवन जिए – ऐसे छह प्रकार के मनुष्य हमेशा दुःख पाते हैं।
यह उक्ति चाहे चैकसी हो या मोदी या माल्या या अन्य सब पर यह सूत्रा लागू होता हैं। इससे समझ में आया की आप ध्न लेकर कहीं भी भागो कर्मों का दंड तो भोगना पड़ता है। आज उसी ध्न के कारण ध्नवान बने और आज ध्न हीन के साथ तन हीन होने से अशक्य हो गए और जिनके कारण ध्न कमाया वे भागीदार नहीं होंगे तुमने गलत काम किये तो अब दर दर की ठोकर खाने को मजबूर होना पड़ रहा है।
इसी प्रकार इस दौरान कोरोना काल में भी लोगों को बहुत अध्कि अन्य कमाई के कारण ध्नवान बन रहे हैं पर जो बेईमानी करके ध्न कमा कर अपने साथ कहाँ ले जायेंगे। आज जो ध्न की भूख के कारण पूरी नैतिकता और मानवीयता छिन्न भिन्न हो रही हैं। इतना ध्न कमाने के बाद भी चोरों जैसे भाग रहे हैं। ऐसे ध्न से क्या पफायदा? गरीब रहना अच्छा। आज क्या हुआ कमाया ध्न सरकार छीन लेंगी और जेल में रहना होगा। कोई भी मान सम्मान नहीं देगा और न परिवार जन सजा में साथ देंग। यदि लोभ न किया होता तो सब कुछ रहता।
इसलिए लोभ पाप का बाप बखाना और पानी का ध्न पानी में और नाक कटी बेईमानी में इसलिए अध्कि ध्न का संचय करना अतिदुख का कारण होता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *