‘महासभा के स्वर्णिम काल खंड का अंत

Creation Feature

डाॅ. ज्योत्स्ना जैन, राष्ट्रीय महामंत्राी-श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महिला महासभा

‘चले जाते हैं जो जहां से
रह जाती हैं स्मृतियां शेष
बनते सदा पथ प्रदर्शक
होते हैं जो कर विशेष।’

श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महासभा के सर्वाध्कि सशक्त किरदार का इस तरह पटाक्षेप होगा किसने सोचा था? श्री निर्मल कुमार जैन सेठी जैसा असाधरण व्यक्तित्व क्रूर काल में हाथों अनायास ही इस तरह हमसे दूर हो जायेगा कल्पना भी नहीं कर सकते पर अपफसोस हम सभी हाथ बांध्े खड़े रह गए और बाबू जी, आप देवलोक गमन कर गये। पुण्यायुक्त अभ्युदय के धरी इस महामना का जाना संपूर्ण दिगम्बर जैन समाज के लिये ऐसी अपूरणीय क्षति बन गया जो भविष्य में कभी पूरी नहीं हो सकती। श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महासभा के विगत 40 वर्षों से एकछत्रा नीति नियन्ता, शासक या पिफर यूं कहें कि सर्वाध्कि प्रिय नेता, जिसने परिवार समाज और देशकाल से ऊपर होकर, अपने अध्यक्षीय कत्र्तव्यों को निर्विवाद पूरा किया। आखिरकार ‘‘ध्र्म के लिए उत्पन्न बालक ध्र्म के लिए होम हो गया।

‘सारथी’ गौरवग्रंथ के संपादन के समय आपके ;बाबूजीद्ध ने बताया था कि सि( क्षेत्रा सम्मेदशिखर जी से, पद् विहार करते हुए परम पूज्य चारित्रा चक्रवती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के श्री महावीर जी अतिशय क्षेत्रा पधरने पर मेरे माता-पिता श्री हरकचंद सेठी जी व सौ. सोहनी देवी उनके दर्शनार्थ पहुंचे तब मैं ;बाबू जीद्ध अपनी माँ के गर्भ में था । तब मेरे माता पिता को आचार्य श्री ने शुभाशीष प्रदान करते हुए उद्घोषणा की थी कि गर्भस्थ शिशु महान धर्मिक प्रभावना करने वाला, परोपकार परायण और यशस्वी होगा।

यो आचार्य श्री का ही आशीर्वाद द्वारा कि श्री निर्मल कुमार सेठी जी तब से लेकर मृत्युपर्यन्त तक केवल और केवल ध्र्म के लिए ही जीयं और ध्र्म पताका को थामें ध्र्म के मार्ग से ही महाप्रयाण को प्राप्त हुए। जीवन भर अहर्निश धर्मिक, सामाजिक उत्थान की उत्कृष्ट आकांक्षा, जैन दर्शन और संस्कृति के संरक्षण का भार जैन पुरातत्व के प्रति गहन आसक्ति, आपको दुष्कर से दुष्कर मार्ग पर भी विचलित नहीं होने देती थी। सच तो यह है कि बाबू जी ऐसे अमृतमय ध्र्म रसाचन में कभी अपनी वाणी से, तो कभी अपने कार्यों से जन-जन के हृदय में बसकर उन्हें असंतोष से मुक्ति दिलाते थे। मैंने जहाँ तक उन्हें समझा वह ऐसे सूत्राधर थे जिन्होंने जैन संस्कृति को जन-जन की संस्कृति बनाने में बहुत बड़ा योगदान दिया था। ज्ञान दर्शन और 12 चारित्रय संपदा के ध्नी, कथनी और करनी की एकरूपता के प्रतीक जिन दर्शन के संवाहक तीर्थ संरक्षक श्री निर्मल कुमार जैन सेठी का व्यक्तित्व संदैव आत्मीय गुणों से युक्त था। आपने महासभा की शाखाएँ ‘ध्र्म संरक्षिणी महासभा के अन्तर्गत आपने तीर्थ संरक्षिणी, श्रुत संवधर््िनी महासभा, महिला महासभा, युवा महासभा तथा राजनैतिक चेतना मंच की स्थापना की जिसमें जैन समाज के लिए दिशा निर्देश, समाज संगठन, देव शास्त्रा गुरू की भक्ति, तीर्थों का संरक्षण व संवरण, मुनि आहार-विहार में साथ-साथ सामाजिक व पारिवारिक उत्थान हेतु शैक्षणिक निध् िजिसमें जैन गरीब परिवारों के बच्चों को आर्थिक रूप से मदद, जिससे कि वो शिक्षित होकर जिम्मेदार नागरिक बन सकंे। इसके अतिरिक्त भी जैन परिवारों की आर्थिक मदद व उनकी कन्याओं का विवाह आदि कार्य प्रमुख रूप से सम्मिलित है।

सच तो यह है कि जो गिने गये वो कार्य तो एक बानगी भर थे, पर आप तो ऐसे समतावाती सूर्य थे जिनमें संयम की उष्मा, तेजस्विता और ज्ञान का प्रकाश दोनों ही थे। आपमें जितनी कर्मठता थी उससे कहीं अध्कि जीवटता, हौसला तो इतना कि पर्वत भी छोटा पड़ जाये। दो-दो युवा पुत्रों की असमय मृत्यु का दारूण दुःख आपके हौसलों को पस्त करने के लिए कापफी था पर नहीं, आप सामाजिक विभूति थे सामाजिक कर्तव्यों से विमुख न हो सके। आपकी माताश्री का देह परिवर्तन हुआ, ध्र्मपत्नी भी साथ छोड़ र्गइं, और छोटा भाई भी देवलोक सिधर गया। आह, एक बाद एक वज्रपात होता रहा पर आप निस्पृही भाव से अपने उद्देश्यो में संलग्न रहे। यहाँ तक कि हर असंभव को संभव करने की कला के आगे आपकी आयु भी कभी आड़े नहीं आई। आपने अपना पूरा समय तन-मन-

ध्न वचन भी महासभा को समर्पित कर दिया। जिस तरह आपके जन्म और आपके भविष्य की भविष्यवाणी परम पूज्य आचार्य श्री शांतिसागर जीने की थी इसी तरह इस श्री दिगम्बर जैन महासभा की स्थापना भी आचार्य श्री नें की थी। 125 वर्षीय महासभा के आप सबसे सशक्त नायक थे। आपकी छत्राछाया में महासमा की चतुर्दिक कीर्ति ने प्रत्येक समाज, प्रत्येक प्रदेश के जन जन को प्रभावित किया। आपकी सभी चतुर्विध् साध्ु संतों के प्रति अनन्य भक्ति रही। समाज में संस्कार, शिक्षा, एकता के लिए आदरणीय बाबू जी ने तन-मन-ध्न से लगकर जो काम किये उसे हम सभी ने देखा है।

तीर्थों के संरक्षण व जीर्णो(ार की समस्या एक विकट समस्या थी, लोगों से पैसा लेना आसान नहीं था, आपने योजनाब( तरीके से ‘‘गुल्लक-योजना’’ प्रारम्भ की। ‘‘गुल्लक’’ के प्रत्येक राज्य के दिगम्बर जैन परिवारों के घरों में रखवाने का प्रयत्न किया और आप कापफी हद तक सपफल भी हुए। गुल्लकों से जो भी ध्न प्राप्त होता आप उसे तीर्थों के जीर्णो(ार में लगाते। इसी तरह आपके द्वारा हजारों जैन मंदिरों का जीर्णो(ार करवाया गया। तीर्थ जीर्णो(ार की बात हो या विदेशों में ध्र्म प्रचार की बात या पिफर, पुरातत्व की संरक्षण की अथवा साध्ु संतों की वै..यावृति, सभी में आपकी अटूट आस्था परिलक्षित होती थी।
आपने अपनी दूरदर्शिता से यह सि( कर दिया कि हमें केवल जैन पुरातत्व के संरक्षण तक ही सीमित नहीं रहना बल्कि जैन दर्शन को जन-जन को बताना चाहिए। इसके लिए आपके सवा सौ वर्ष प्राचीन ‘‘जैन गजट’’ अखबार की निरंतरता बनाये रखने के साथ-साथ जैन तीर्थ जीर्णो(ार पत्रिका, श्रुत संवधर््िनी पत्रिका, तथा महिला महासभा के मुख पत्रा ‘‘जैन महिलादर्श’’ के प्रकाशन को भी वरीयता दी। तथा इन सभी पत्रा पत्रिकाओं के सपफल प्रकाशन के द्वारा जैन दर्शन को घर- घर तक पहुंचा दिया। यही नहीं आपने महासभा से अनेक दुर्लभ पुस्तकांे का प्रकाशन भी समय-समय पर करवाकर समाज को साहित्य प्रदान किया। सच तो यह है कि आप वृ(ों के लिए उफर्जा थे तो नवयुवकों के लिए प्रोत्साहन निध्ी। आपने देश के हर राज्य में महासभा का गठन किया और प्रत्येक राज्य के वृ( और युवा दोनों को जोड़ा यही कारण है कि आज लाखों की संख्या में ‘‘दिगम्बर जैन परिवार’’ महासभा के स्वर्णिम काल के साक्षी और अटूट हिस्सा है। महासभा के 125 वर्षीय काल खंड मे श्री निर्मल कुमार सेठी जी अध्यक्षता के 40 वर्ष महासभा के लिए ‘‘स्वर्णिम काल’’ रहा। और अब अचानक 27 अप्रैल 2021 को श्री निर्मल जैन सेठी जी के साथ ही महासभा के ‘‘स्वर्णिम काल खंड’’ का अंत हो गया। इसलिए कहते हैं संत अपने लिए नहीं, विश्व के लिए जीता है और विश्व कल्याण के लिए ही कायोत्सर्ग करता है सही अर्थों में आप किसी संत से कम नहीं थे।

 

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