पावापुरी-नालन्दा का पुरातत्त्व

Creation Feature

सरिता महेन्द्र वुफ. जैन, राष्ट्रीयाध्यक्षा श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महिला महासभा

पावापुरी बिहार के नालन्दा जिला में स्थित है। इसके पावापुर, अपापपुरी, पावा आदि नाम भी हैं। जैनध्र्म के चैबीस तीर्थंकरों की श्रृंखला में अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर का निर्वाण अब से 2547 वर्ष पूर्व इसी पावापुर या पावापुरी से हुआ था। यहां तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का निर्वाण/मोक्ष स्थल ‘जलमंदिर’ है। कहते हैं महावीर स्वामी के निर्वाण होने पर यहां इतने श्र(ालु इकट्ठे हुए कि उन्होंने यहां की चुटकी-चुटकी मिट्टी उठाकर कर माथे पर लगाई जिससे यहां तालाब बन गया। जो आज भी है। इसी तालाब के मध्य तीर्थंकर भगवान महावीर का निर्वाण स्मारक है, जिसे जलमंदिर कहते हैं। इस तालाब के किनारे दिगम्बर जैन कोठी मंदिर, पाण्डुकशिला स्थित है और यहां से लगभग डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर जैन श्वेताम्बर कोठी मंदिर है। पुरातत्त्व की दृष्टि से यहां कोई बड़ा मंदिर नहीं है। किन्तु दिगम्बर जैन कोठी मंदिर में चार पुरातन जैन मूर्तियां हैं जो बहुत ही पुरातात्त्विक महत्व की हैं। यहां के मुख्य मंदिर के दोनों तरपफ ताखों में ये दो दो प्रतिमाएं स्थापित हैं, जो कुछ कुछ खंडित होने से पूजी नहीं जाती हैं। क्योंकि मान्यतानुसार जो प्रतिमा सर्वांग व अखण्ड होती है।

पाश्र्वनाथ प्रतिमा भूरा पाषाण-

इस वेदी में दो तरपफ दो दो और बीच में एक प्रतिमा पुरानी है। दर्शन के बाएं तरपफ ताखे में दो मूर्ति हैं। एक श्याम पाषाण की और एक भूरा पाषाण की। भूरा पाषाण मूर्ति 21 इंची ऊँची और 13.5 इंच चैड़ी है। जटाजूट मुकुट ऊँचा है, केश-उष्णीस मूर्ति के सिर को सप्तपफणों से युक्त दर्शाया गया है। ग्रीवा-त्रिवली, कर्ण लम्बित स्कंधें को स्पर्श कर रहे हैं। वक्ष पर श्रीवत्स नहीं है। नाभि ठीक है। हथेलियों और पैर के तलवों में चक्र अंकित है। दोहरे ;ऊपर-नीचे पंखुड़ियों युक्तद्ध कमल पर आसनस्थ ध्यानमुद्रा में दर्शाया गया है। परिकर अंकन में प्रतिमा के दोनों तरफ दो चंवरधारी, दाहिने हाथों में एक एक चंवर लिए हुए जो ऊपर हो हैं और वायां हाथ जंघा पर टिकाए आराम मुद्रा में दर्शाये गये अंकित हैं। गगनचारी गंध्र्वदेव हाथों में मालाएं लिए पृष्ठभूमि में मेघ अंकित हैं। माल्यधरियों के ऊपर मूर्ति के बाएं तरफ झाँझ-मजीरा और दाएं तरफ ढोल लिए हाथ दुंदुभि वादक उकरित हैं। प्रतिमा के ऊपर छत्रा-त्राय उकरित है। सिंहासन के सिंह नहीं है। यक्ष-यक्षी के स्थान खण्डित हैं। इस प्रतिमा के परिकर का बाहरी किनारा कलायुक्त है।

पाश्र्वनाथ प्रतिमा श्याम पाषाण-

दूसरी भगवान पाश्र्वनाथ की प्रतिमा 15.5 इंची ऊँची और 11 इंची चैड़ी है। यह श्याम पाषाण में पद्मासन प्रतिमा है। इसमें सप्त-पफणाच्छादन होने से यह पाश्र्वनाथ भगवान की निर्णीत है। दोनों पाश्र्वों में दाहिने हाथों में चंवर लिए चंवरधरी, उनसे ऊपर माल्यधरी, उनसे ऊपर दुंदुभिवाद्य दर्शाये गये उत्कीर्णित हैं। सबसे ऊपर बीच में छत्रा-त्राय उकरित है। प्रतिमा दोहरे कमल पर आसीन है। कमल के नीचे पादपीठ है जो महत्व का है। पादपीठ पर दोनों ओर दो दो भक्त ;संभवतः युगलद्ध अंकित हैं। बीच में चक्र, चक्र के दोनों ओर संभवतः अनुकूलाभिमुख सिंह या मृग ;पूर्णतः स्पष्ट नहीं हैंद्ध अंकित हैं। पादपीठ पर बायीं ओर के चवंरधरी के बाद खड़ी हुई एक प्रहरी जैसी आकृति अंकित है। किसी प्रतिमा पर लेख स्पष्ट नहीं है इस कारण समय अज्ञात है, किन्तु चक्रयुक्त प्रतिमा मथुरा की 5वीं शदी के लगभग की प्रतिमाओं से साम्य रखती है।
चैबीस तीर्थंकर सपरिकर प्रतिमा पट्ट

दर्शक के बाएं ओर वेदी के दाहिने ही ताखे में दूसरी काले पाषाण की 21.5 इंच ऊँची 11 इंच चैड़ी चैबीसी प्रतिमा है। इस शिलापफलक में परिकर रहित मूलनायक 6 बाई 5.5 इंच की प्रतिमा है। शेष परिकर में बनी पद्मासन प्रतिमांए दो-दो इंची की हैं। मूल नायक के अतिरिक्त ग्यारह बांएं और इतनी ही दांयें ओर प्रतिमाएं हैं, एक सबसे ऊपर और एक मूलनायक, इस तरह एक पफलक में चैबीस तीर्थंकर प्रतिमाएं अंकित हैं। मूलनायक के बगल में एक एक पद्मासन तीर्थंकर प्रतिमा के नीचे चंवरधरी ऐसे अंकित हैं मानों दूर से देखने पर खड्गासन तीर्थंकर हों, क्योंकि इनके दोनों हाथ नीचे की ओर हैं और समपादासन में हैं, जबकि प्रायः चंवरी एक पैर टेके हुए दर्शाए जाते हैं। हो सकता है ये )षभनाथ के भरत-बाहुबली दोनों पुत्रा अंकित हों।

मूलनायक की मुखाकृति खरुची हुए प्रतीत होती है। मूलनायक के सिर की पृष्ठभूमि में किसी बड़े पत्रों वाले वृक्ष की शाखाएं अंकित हैं, जो तीर्थंकर का केवलज्ञान वृक्ष कहलाता है। मूर्ति के वक्ष में बड़ा और बढ़व सा श्रीवत्स चिह्न अंकित है। कमलासन के स्थान पर ऊँची सी पादपीठ ही हैै जिस पर एक पंक्ति का एक लेख है, किन्तु खंडित होने से अवाच्य है। सिंहासन के स्थान पर विपरीताभिमुख दो वृषभ हैं। वृषभों के बीच में एक आयुध् युक्त यक्ष बना है। दोनों वृषभों के बाद किनारों पर सेवकों के नीचे विपरीताभिमुख एक एक गज-हाथी अंकित है। मूलनायक के सिर के ऊपर एक बड़ा छत्रा है, उसके ऊपर एक आकृति है जो अपना बायां पैर और दाहिना घुटना टेक कर बैठा है। दोनों हाोिं में सामने को एक लम्बा और मोटा दण्ड सा सम्हाले है जो बड़ी बांसुरी सी प्रतीत होती है। इस आकृति के दोनों ओर लगभग मूलनायक के बराबर ऊँचाई के एकएक हाथी जो पिछले दोनों पैर मोढे़ हुए अगले पैरों पर खड़े सूंड़ में कुछ लिए ऊपर को किये हुए दर्शाने गये हैं, हाथियों पर एक एक इन्द्र आरूढ़ उत्कीर्णित है। लगभग इसी तरह का एक और चतुर्विंशति तीर्थंकर पट्ट है। इसमें अध्कि वैसाम्य नहीं है।

एक तीर्थंकर प्रतिमा

यहां की मुख्य वेदी पर एक और छोटी सी ;8 बाई 6 इंची कीद्ध पाषाण की प्राचीन तीर्थंकर प्रतिमा है। परिकर कलायुक्त है। दोहरे कमल पर पद्मासनस्थ तीर्थंकर के वक्ष पर तिकोन श्रीवत्स बना है। दोनों ओर चंवरधारी, ऊपर छत्रा अंकित है। माल्यधरी नहीं हैं। पादपीठ पीठ पर बीच में नौ आरा का ध्र्मचक्र है, चक्र के दोनों ओर चक्राभिमुख दो सूकर जैसे चिह्न हैं। इनके लम्बे मुंह और बड़े कान हैं। यदि ये सूकर हैं तो तेरहवें तीर्थंकर विमलनाथ भगवान की प्रतिमा निर्णीत होती है।
इस तरह पावापुरी के इस दिगम्बर जैन कोठी मंदिर में पुरातत्त्व की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण पांच प्रतिमाएं स्थापित हैं। ये प्रतिमाएं मथुरा जैसे ध्र्मचक्रांकन से 5वीं से 8वीं शती की प्रतीत होती हैं।

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