अध्यक्षीय उद्बोधन

Creation Feature

आमतौर पर हम सब ‘योग’ के चाहने वाले हैं। योग में बहुत सारी बातें हो
जाती हंै। गणित की भाषा मे ं‘योग’ याने ‘धन’। वर्षायोग – जिस प्रकार गर्मी में
तपन के द्वारा समुद्री जल बादल सोखते हैं फिर योग मिलने पर वर्षा के दौरान जल की वर्षा कर देते हैं, इसी प्रकार वर्षायोग के दौरान हमारे परम आराध्य दिगम्बर आचार्य, दिगम्बर मुनि, आर्यिका माताजी, ऐलकजी, क्षुल्लकजी महाराज, भटट्ारक स्वामीजी आदि सभी त्यागी जीवात्मा एक स्थान पर रहकर धर्म पिपासुओ ंके लिए धर्म की वर्षा करते हैं जिसे हम चातुर्मास कहते हंै। चातुर्मास को यदि हम कहंे कि यह समय चतुर बनने का है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

हमारी बहनें जो ‘चतुर’ हैं हर कार्य में, घर, गृहस्थी, परिवार, समाज, धर्म, राजनीति में बहनों की साख छुपी हई नहीं है वे हर दम आगे हंै। धार्मिक कार्यों में भी हमारी बहनें निरंतर आगे बढ़कर हर धार्मिक कार्य में सक्रिय रहती हैं। उनकी सक्रियता से धर्म में निरंतर प्रगति है, इसमें शक नहीं है। प्रत्येक ग्राम नगर में चातुर्मास स्थापित होने वाले हैं, ऐसी स्थिति में हम महिलाओं को क्या करना चाहिए ? यह प्रश्न हम सबके मन में हो सकता है। मैं पूर्व में लिख चुकी हूॅं कि हम सबके ‘चतुर’ बनने का समय है। हम सीखें और साथ ही महिलाओं की साख को भी बढ़ायें। चातुर्मास के दौरान हम महिलाएँ निरंतर सक्रिय रहकर हमारे आराध्य, हमारी पहचान दिगम्बर गरुुओं का चरण सान्निध्य प्राप्त कर धर्म के संरक्षण, संवर्धन में अपने आपको समर्पित करें। इस दौरान हमारा प्रयास हो कि हमारा परिवार, बच्चे संस्कारित हांे, इस हेतु उन्हें समय निकालकर साथ लेकर जाएँ, यदि हम माँ हैं तो बच्चों की प्रथम गुरु भी हैं। साथ ही अपने परिवार की संरक्षिका व संस्कार प्रदाता भी। परिवार में धर्म संस्कार को मजबूत करें ।

हम महिलाएँ समाज को साथ लेकर चलती हैं। समाज की मजबूती एवं एकजुटता के लिए प्रयास करें, सभी पंथ-ग्रंथ के लोग जुड़ें, सद्भाव मजबूत होगा तो हमारा समाज मजबूत होगा। धर्म के प्रसार-प्रचार व स्थायित्व के लिए हमारा समाज मजबूत होना चाहिए समाज की मजबूती में हम अपना योगदान देते आए हैं और दे रहे हैं तो हम अपना एक महत्वपूर्ण दायित्व का निर्वहन करते हैं। अनेक आयोजन हो सकते हैं, होते हैं, लेकिन आयोजन में भीड़ ही पैमाना न हो, गुणवत्ता हो, क्या खोया, क्या पाया का चिंतन हो तो हमारा आयोजन सफल हो सकेगा। हम महिलाएँ परिवार, समाज, देश की तकदीर बदल सकती हैं। क्योंकि नारी की शक्ति आज से नहीं अनादिकाल से है। चातुर्मास के दौरान ध्यान रखें हमारे चतुर बनने का समय है साथ ही हर कार्य में चतुराई दिखाई देनी चाहिए।

सर्वाधिक अहम् बात कोरोना काल है भयानक संक्रमण फैलने की आशंका बनी हुई है अतः सभी बहनों से मेरा विनम्र निवेदन है कि परमपूज्य मुनि वंृदों व आर्यिकाओं के दर्शन करते समय विशेष सावधानी बरतें, सामाजिक दूरी का पालन करें, मास्क लगायें, स्वयं भी सुरक्षित रहें, दूसरों को भी रखें।

संकलन इन्द्रा जैन

भारत के चमकते सितारे का देदीप्यमान देदीप्यमान देदीप्यमान नक्षत्रा

बहुमुखी प्रतिभा की ध्नी – श्रीमती सरिता महेन्द्र कुमार जी जैन

हमारे देश में अनगिनत नदियाँ हैं, किन्तु आत्र्तजनों के दुःख, संताप हरने का कार्य सिर्फ गंगा ही कर सकती है, ठीक इसी तरह स्त्रियों में ‘‘सरिता जी‘‘ जैसी महिला रत्न ही अपने नाम को सार्थक कर सकती है। श्रीमती सरिता महेन्द्र कुमार जैन, सरिता की भाँति अपने मंद-मंद शीतल प्रवाह से जन-जन में स्नेह रस आप्लावित करती रहती है। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के चिलकाना ग्राम के जमींदार परिवार श्रावक श्रेष्ठी श्री त्रिलोकचंद जी एवं सरलादेवी के घर 30 मार्च 1948 को सरिता जी का जन्म हुआ। इस परिवार को सदैव ही श्री सहजानंद वर्णी जी का सानिध्य एवं आशीर्वाद मिलता रहा, जिससे धर्म के प्रति श्रद्धा एवं समर्पण, मुनिराजों को आहारदान, वैयावृत्ति के संस्कार उनके रोम-रोम में बचपन से ही समाहित हैं। 30 जनवरी 1969 को जब श्री महेन्द्र जी के साथ इनका पाणिग्रहण हुआ तो इन्होंने अपने विचारों से पति को अवगत कराया। यद्यपि तब श्री संस्कार महेन्द्र जी विदेश में अध्ययनरत थे तथापि सरिता जी की धार्मिक, तीर्थों के जीर्णोद्धार व समाज सेवा की भावना से वह अभिभूत एवं प्रभावित हुए और तब से लेकर आज तक दोनों पति-पत्नी समन्वय की भावना से, कंधे से कंधा

मिलाकर पुण्य कार्यों के प्रति कृत संकल्प है। वर्तमान में सरिता जी के दो पुत्ररत्न, पुत्रवधुएँ, पौत्र, पौत्री सहित भरापूरा खुशहाल
संस्कारित परिवार है, जो उनके प्रत्येक कार्य में, कदम से कदम मिलाकर सहयोग देता है। सरिता जी ने एम.ए. (राजनीति विज्ञान) की उपाधि प्राप्त करने के साथ चिकित्सकीय योग्यताएँ भी अर्जित की हैं।

आयुर्वेद – भारत के प्रसिद्ध गुरू वैद्यराजश्री सुशील कुमार जैन, जयपुर के मार्गदर्शन में 1990 में आयुर्वेदिक डिप्लोमा प्राप्त
किया।

प्राणिक हीलिंग – ग्रैंडमास्टर चाऊ कोक सई के निर्देशन में आपने प्राणिक चिकित्सा का गहरा अध्ययन और अभ्यास किया है।
पिरामिड थैरेपी – ब्रह्माण्ड में मौजूद गुप्त ऊर्जा को अनलॉक करने के लिए इस थेरेपी में मन और बात के बीच ऊर्जा के इस प्रवाह को चैनलाइज्ड किया जाता है। आपने वर्षों तक इसका अध्ययन अध्यापन कर भारत में इसकी लोकप्रियता बढ़ाई। रत्न और रंग चिकित्सा – रत्न, मणियाँ एवं उनके रंगों का मानव जीवन के सभी पहलुओं यथा भावनात्मक, शारीरिक और आध्यात्मिक जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इस क्षेत्र का भी सरिता जी को कई वर्षों का अनुभव है। आपने योग और ध्यान की विभिन्न परम्पराओं के प्राचीन रूपों का भी अध्ययन किया है। आप योगासन की विविध कलाओं में प्रवीण हंै और कार्यशालाओं का आयोजन करती रहती हैं। सामाजिक एवं धार्मिक कार्य

  • सरिता जी ने सर्वप्रथम तमिलनाडु की प्राचीन विरासत को संजोया और अभी तक लगभग 350 मन्दिरों का जीर्णोद्धार करवा चुकी हैं।
  • प्रतिदिन जिनेन्द्र भगवान का दर्शन, पूजन, आरती भक्ति होती रहे, इसी हेतु तमिलनाडु के 125 से अधिक मन्दिरों में पंडित एवं पुजारियों की व्यवस्था कर उन्हें प्रतिमाह वेतन, अनाज व कपड़े आदि प्रदान करती है। वहाँ नियमित दर्शन, पूजन एवं भक्ति से इन मन्दिरों की ख्याति दूर-दूर तक फैल रही है।
  • जो स्त्रियाँ किसी भी शारीरिक कमी के कारण माँ नहीं बन पाती और अपना इलाज कराने में असमर्थ होती हैं, सरिता जी उनके इलाज, दवाईयाँ, देखरेख के साथ आर्थिक रूप से भी मदद करती है ताकि उनको मातृत्व सुख की प्राप्ति हो सके।
  • सरिता जी श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महिला महासभा की ‘‘राष्ट्रीय अध्यक्षा‘‘ के पद पर सुशोभित हैं। जैन समाज की स्त्रियों के उत्थान पर उनकी हमेशा नजर रहती है। उन्होंने सम्पूर्ण देश का भ्रमण कर महिला शक्ति को सशक्त बनाया है तथा महासभा के माध्यम से वर्तमान में भी ‘‘महिला कल्याण‘‘ के लिए कार्यरत हैं।
  • वर्ष 2016-17 में आप भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी मुम्बई के 115 वर्षों के इतिहास में प्रथम महिला के रूप में राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर मनोनीत/निर्वाचित र्हुइं। आपने सम्पूर्ण देश के तीर्थक्षेत्रों का भ्रमण कर समाज को उनके जीर्णोद्धार और रख-रखाव के लिए प्रोत्साहित किया। भारतवर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र कमेटी के इतिहास में आपका नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है।
  • दक्षिण की माँ और उत्तर भारत की सरिता दी ने समाज से तिरस्कृत व उपेक्षित बच्चों का पालन पोषण करने के लिए ‘‘पालना‘‘ नामक संस्था को सहयोग दिया है।
  • दुर्घटना में जले हुए व्यक्तियों के घावों पर मरहम लगाने और उन्हें पुनः पहचान देने के लिए‘‘ सरिता दी‘‘ कृत संकल्प हैं और अपनी संस्था द्वारा आर्थिक सहयोग देकर इन दुर्घटनाग्रस्त व्यक्तियों का पूरा इलाज करवाती हैं।
  • बालक बालिकाएँ हमारे देश का उज्जवल भविष्य हैं, इसी हेतु अर्हंतगिरी में इनके लिए एक हाॅस्टल की स्थापना की जिसमें 775 बच्चे अध्ययनरत हैं।
  • अर्हतगिरी के आस पास कई छोटे-छोटे गाँव हैं, जहाँ बिजली की व्यवस्था ना के बराबर है। सरिता दी ने 1000 सोलन लालटेन उन गाँवों में बँटवाकर पुण्य का उजाला अपने हिस्से में किया है। अभी हाल ही में यहाँ 4 मकान बनवाकर असहाय लोगों को उपहार स्वरूप दिए है।
  • सरिता दी ने असहाय व अनाथ बच्चों के लिए आश्रम की स्थापना की। साथ मे के.जी. से लेकर 12वीं कक्षा तक अंग्रेजी
  • माध्यम से शिक्षा की समुचित व्यवस्था भी की है। आपका अर्हंतगिरी तीर्थक्षेत्र के विकास में भी विशेष योगदान है।
  • सरिता दी अन्नपूर्णा बनकर 20 गाँवों में 2200 परिवारों को 10 टन चावल एवं 1000 किलो दाल वितरित करती हैं।
  • डिप्रेशन और कैंसर जैसी भयावह बीमारी के मरीजों को भी सहायता देते हैं। किसी ममतामयी माँ की भाँति इनके इलाजऔर देखभाल की व्यवस्था करती हैं।
  • आँखे हैं तो संसार खूबसूरत है, इसीलिए सरिता दी ने अहमदाबाद, चैन्नई और श्रवणबेलगोला में ऑपरेशन थियेटर बनाने में सहयोग किया है।
  • मद्रास में एक कैंसर हॉस्पिटल की धर्मशाला में एक पूरे फ्लोर का निर्माण करवाया ताकि मरीजों व उनके तीमारदारों को कोई परेशानी ना हो।
  • सामाजिक कार्यों के साथ-साथ आध्यात्मिकता में भी सरिता दी पूरी तरह से समर्पित हैं। उन्होंने देश के अनेकों बड़े-बड़े पंचकल्याणकों में धर्म प्रभावना के लिए 9 बार सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी एवं यजमान पद का सौभाग्य प्राप्त किया है।
  • आप श्रवणबेलगोला तीर्थक्षेत्र एवं वहाँ के पीठाधीश चारूकीर्ति भट्टारक महास्वामी जी से गत 40 वर्षों से बहुत नजदीकी से जुड़ी हुई हैं। विगत 4 बारहवर्षीय महामहोत्सव में आपका विशेष योगदान रहा है। वर्ष 2018 का महामस्तकाभिषेक आपकी अध्यक्षता में ही सम्पन्न हुआ। यह जैन समाज के लिए बहुत ही गौरव का विषय रहा है कि आपके प्रयासों से इस महामस्तकाभिषेक में सम्पूर्ण देश से 9 आचार्य सहित 325 पिच्छी विद्यमान रही, जिनकी गरिमामयी उपस्थिति में कार्यक्रम शोभायमान हुआ। दिगम्बर जैन धर्म के इस आयोजन में भारतवर्ष के महामहिम राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह, केन्द्रीय मंत्री श्री अनंत हेगड़े आदि अनेकों केन्द्रीय मंत्री, सांसद तथा प्रदेशों के राज्यपाल, मुख्यमंत्री एवं मंत्रियों की सहभागिता रही। यह सब आपकी मेहनत का ही परिणाम था कि यह महोत्सव अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर गरिमामयी सफलता के साथ सम्पन्न हुआ। सरिता जी को अनगिनत आचार्यों व साधुओं का आशीर्वाद प्राप्त है, साथ ही अनेक संस्थाओं और ट्रस्टों की भी वो ट्रस्टी है तथा अनेकों सम्मान व उपाधियाँ भी उन्हें प्राप्त हुई है। जिसमें प्रमुख हैः-
  1. श्रवणबेलगोला में श्री सृष्टिभूतिमाता जी तथा भट्टारक श्री चारूकीर्ति स्वामी जी द्वारा ‘‘दान चिंतामणि‘‘।
  2. आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज द्वारा “भामाशाह”।
  3. अर्हंतगिरी में ‘‘दान-चिंतामणि‘ की उपाधि ।
  4. श्री दिगम्बर जैन समाज, चैन्नई द्वारा भी आपको “जिनधर्म परायणी’’ तथा श्रुतसेव न्यास, फिरोजाबाद समाज द्वारा ‘‘जिन धर्मोपासिका‘‘ अलंकरण।
  5. श्री पाश्र्वनाथ दिगम्बर जैन मन्दिर ट्रस्ट, बीजापुर द्वारा ‘‘समाज-रत्न‘‘ एवं ‘‘श्राविका रत्न‘‘।
  6. दगम्बर जैन श्राविका श्रम, सोलापुर द्वारा ‘‘महिला रत्न‘‘।
  7. अखिल भारतीय दिगम्बर जैन महासमिति, महिला प्रकोष्ठ, मध्य प्रदेश की ओर से सन् 2000 में ‘‘ब्रह्मसुन्दरी‘‘ अलंकरण से अलंकृत किया गया।

डाॅ. महेन्द्रवुफमार जैन ‘मनुज’

भगवान ऋषभदेव ने मानव जाति को स्वावलम्बन की कला सिखाई

जैन परम्परा में मान्य चैबीस तीर्थंकरों की श्रृखंला में भगवान )षभदेव का नाम प्रथम स्थान पर है और अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी हैं। वेद जो विश्व के प्राचीनतम लिपिब( ध्र्म ग्रंथों में से एक है में तथा श्रीमद्भागवत इत्यादि में आये भगवान )षभदेव के उल्लेख अलग अलग नामों से उल्लिखित है। किसी रूप में विश्व की लगभग समस्त संस्कृतियों में )षभदेव की उपस्थिति उनकी सर्वमान्य स्थिति और जैनध्र्म की प्राचीनता को व्यक्त करती है। भगवान )षभदेव भारतीय संस्कृति के उन्नायक के रूप मंे बल्कि विश्व मानव विकास की प्रथम कड़ी के रूप प्रतिष्ठित करते हैं। भगवान )षभदेव ने मानव जाति को स्वावलम्बन की कला सिखाई, पुरुषार्थ का उपदेश दिया।

जैन मान्यतानुसार भगवान )षभदगव ने ही असि, मसि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प इन षट क्रियाओं की शिक्षा दी।

  1. असि – असि का अर्थ तलवार है। जो देश की रक्षा के लिए तलवार लेकर देश की सीमा पर खड़े रहकर देश की रक्षा करते हैं,
    ऐसे सैनिक एवं नगर की रक्षा के लिए भी सिपाही एवं गोरखा आदि रहते हैं।
  2. मसि – मसि अर्थात् स्याही। स्याही-कलम से लेखा-जोखा रखने वाले, मुनीमी करने वाले, अमानत रखना-देना आदि।
  3. कृषि जीव हिंसा का ध्यान रखते हुए खेती करना अर्थात् अहिंसक खेती करना, अनाज उपजाना एवं पशुपालन करना।
  4. विद्या बहतर कलाओं को करना अथवा शैक्षणिक कार्य करना।
  5. शिल्प सुनार, कुम्हार, चित्राकार, कारीगर, दर्जी, नाई, रसोइया, मूर्तिकार, मकान, मन्दिर बनाना, नक्शे बनाना अदि।
  6. वाणिज्य – सात्विक और अहिंसक व्यापार, उद्योग करना।

इन शिक्षाओं के अतिरिक्त सम्राट )षभदेव प्रजा का पालन करने के लिए सबसे पहले प्रजा की सृष्टि का विभाग करते हुए वर्ण व्यवस्था की, पिफर उनकी आजीविका के नियम बनाये, जिससे प्रजा अपनी-अपनी मर्यादा का उल्लंघन न कर सके। आदिब्रह्मा ने अपनी दोनों भुजाओं में शस्त्रा धरण कर क्षत्रियों की सृष्टि की थी अर्थात् उन्हें शस्त्रा विद्या का उपदेश दिया था, क्योंकि जो हाथों में तलवार आदि लेकर सबल शत्राुओं के प्रहार से निर्बलों की रक्षा करते हैं वे ही क्षत्रिय कहलाते हैं। तदनन्तर प्रभु ने अपने ऊरुओं से यात्रा दिखलाकर अर्थात् परदेश आकर ध्न कमाना व्यापार करना सिखलाकर वैश्यों की रचना की, व्यापार करना ही उनकी मुख्य आजीविका है। बु(िमान् )षभदेव ने दैन्यवृत्ति में तत्पर रहने वाले शूद्रों की रचना की, उत्तम वर्णों की सेवा-शुश्रूषा आदि करना ही उनकी आजीविका है। और ब्राह्मण वर्ण की रचना की गई। सम्राट )षभदेव ने उस समय यह नियम बनाए कि शूद्र, शूद्र की आजीविका ही करे, अन्य न करे। वैश्य वैश्यवृत्ति ही करे कदाचित् शूद्रवृत्ति भी कर सकता है। क्षत्रिय, क्षत्रिय की आजीविका ही करे, कदाचित् वह भी शूद्र और वैश्य की कर सकता है किंतु अपनी-अपनी इन आजीविकाओं को छोड़कर जो कोई भी अन्य की वृत्ति-आजीविका को करेगा, वह राजाओं द्वारा दण्डनीय होगा और यदि ऐसा नहीं करेंगे तो वर्णसंकर हो जावेगा।

इसी प्रकार द्धषभदेव ने प्रजा के योग यनवीन वस्तु की प्राप्तिद्ध और क्षेम यप्राप्त वस्तु की रक्षाद्ध की रक्षा के लिए ष्हाए माए और ध्क्ष्ि इन तीन दण्डों की व्यवस्था कर दी। दुष्ट पुरुषों का निग्रह करना और सज्जन पुरुषों का पालन करना यह व्यवस्था भोगभूमि में नहीं थी क्योंकि उस समय पुरुष निरपराधी होते थे और अब कर्मभूमि में अपराध् शुरू हो जाने से दण्ड व्यवस्था की आवश्यकता हो गई थी। डाॅण् महेन्द्रवुफमार जैन ष्मनुजष् जुलाईरू 2021 22 अब प्रश्न उठता है कि भगवान द्धषभदेव को वर्ण व्यवस्था और षट क्रियाओं की शिक्षा क्यों देना पड़ीए इससे पहले क्या व्यवस्था थी। जैन मान्यतानुसार उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल के छह छह भेद हैं। वर्तमान में अवसर्पिणी के छह कालों में पंचम काल चल रहा है।

छह कालों में से प्रथमए द्वितीय और तृतीय काल में क्रम से उत्तमए मध्यम और जघन्य भोगभूमि की व्यवस्था रहती है। भोगभूमि में 10 प्रकार के कल्पवृक्ष होते हैंए इन्हीं कल्पवृक्षों से मानव को अपने दैनिंदिन भोग.उपभोग की सामग्री प्राप्त होती हैए जिस कारण से आपसी कलहए लूटपाटए ऊंचनीच आदि के अवसर ही नहीं रहते थे। तृतीय काल के अन्त में ये कल्पवृक्ष नष्ट होने लगते हैं तव प्रजा अपने सम्राट से आजीविका के साधन पूछती है और द्धषभदेव वर्ण व्यवस्था और षट क्रियाओं की शिक्षा देते हैं।

अयोध्या नगरी में जन्मे )षभदेव राजा नाभिराय के पुत्रा थे, इनका विवाह यशस्वती और सुनन्दा नामकी दो कन्याओं से होता है। पिता नाभिराय ने )षभदेव का राज्याभिषेक कर सन्यास धरण कर लिया। )षभदेव के दो पुत्रा भरत और बाहुबली के साथ 98 अन्य पुत्रा और दो पुत्रियां ब्राह्मी और सुन्दरी हुई जिन्हें उनके द्वारा अथाह ज्ञान दिया गया। ब्राह्मी को लिपि विद्या दी जो आज भी ब्राह्मी लिपि नाम से ख्यात है और सुदरी को अंकविद्या प्रदान की जो सभी लिपियों-भाषाओं में प्रयुक्त होती है। )षभदेव ने गृहस्थ में रहकर समस्त ज्ञान दिया और जनमानस को स्वावलम्बन युक्त जीवन जीने की कला सिखाई। मानव के मन में भ्रातृभाव की ज्योति जगाई और अन्त में अपने बड़े बेटे चक्रवर्ती भरत को राज्य देकर सन्यास धरण किया और अनेक मानव भी गृह त्याग कर इनके साथ )षि बन गये। जो )षभ से )षि परम्परा का आरम्भ हुआ और सन्यास धारण करने से शरीर से शिव हो गये। भरत के नाम से इस देश का नामकरण ‘भारतवर्ष’ इन्हीं की प्रसि(ि के कारण विख्यात हुआ।

इस प्रकार तीर्थंकर )षभदेव मानव जाति को स्वावलम्बन की कला सिखाई, पुरुषार्थ का उपदेश दिया, उन्होंने पर्यावरण सन्ुतलन महिला साक्षरता तथा स्त्राी समानता पर भी महत्वपूर्ण कार्य किया है। भगवान )षभदेव की शिक्षाएं मानवता के कल्याण के लिए हैं, उनके उपदेश आज भी समाज के विघटन, शोषण, साम्प्रदायिक विद्वेष एवं पर्यावरण प्रदूषण को रोकने में सक्षम एवं प्रासंगिक हैं।

ईश्वर एक दिव्य अनुभूति हैं

ईश्वर का अर्थ क्या है? क्या यह कहीं बैठा कोई व्यक्ति है? परमात्मा कहीं बैठा नहीं है। हम जो सोचते है,ं जो विचारते हैं, केवल यही ईश्वर नहीं है। ईश्वर का अर्थ है इस अखिल ब्रहमाड में फैला विस्तार और उस विस्तार में छिपी हरेक पूर्णता। वह न तो सिर्फ स्थिर है, न ही वह गतिमान है। वह केवल बैकुंठ, कैलाश या फिर किसी और लोक में नहंी है, बल्कि वह हर जगह हैं। यह सूक्ष्म से सूक्ष्मतम हैं, विशाल से विशालतम हैं। जो पौधे हैं, जो सूर्य, चाॅंद और तारे हैं, जो नदियाॅं हैं, पहाड़ हैं, जंगल और जीव जंतु हैं – यह सब उसका ही विस्तार है। पक्षियों में वही तो कलरव करता है, वृक्षों में फूल-फूल और सुगंध भी वही है। चहुॅं ओर वही हवाओं में बह रहा है। उसी का शोर सागर में लहर बनकर घूमता है। आकाश के अनंत विस्तार में भी वही है। हम खुद उस लहर के एक सूक्ष्मतम रूप हैं, बस इसका बोध हो जाए, इतना ही काफी है। हमको परमात्मा नहीं दिखते है क्योंकि न तो हम झुकते हैं, न रूकते हैं और न ही हम देखते है। झुकने के लिए भाव चाहिए, रुकने के लिए चेतना चाहिए और देखने के लिए अंतरात्मा की पवित्रता चाहिए। जिस दिन यह तीनों हमारे अंदर आ गया, उस दिन सृष्टि के सभी तत्वों में परमात्मा का नृत्य दिखेगा। हर एक जड़-चेतन में परमात्मा का संगीत सुनाई पड़ेगा। सृष्टि की हर एक दिशा से परमात्मा हमारी और ही आ रहे हैं मगर हम उनकी नहीं सुनते। सांसारिक कुशलता से परिपूर्ण व्यक्ति सदैव अपने को भरना चाहता है। कभी धन से, कभी वासना से, कभी ज्ञान से, कभी तृष्णा से और कभी प्रभु नाम से। कुशलता के वशीभूत होकर हम अगर अपने को भर लेंगे, तो ईश्वर का काम कठिन हो जाएगा। दिव्यात्माएं जब तक निर्वाण के लिए प्रयास करते रहती हैं तब तक कष्ट, परेशानी और असफलता ही मिलती। जिस दिन उन्होंने अपने आप को छोड़ दिया, स्वयं से स्वयं को खाली किया, उसी दिन वह भर जाती हैं। ईश्वरीय अनुग्रह का साक्षात्कार सहज ही प्राप्त हो जाता है। शांतिपूर्ण जीवन के लिए जरूरी है कि हम चेतना को अगले स्तर तक ले जाएं। अपने विकास के लिए जरूरी है कि हम ईश्वर को कोई रूप या चेतना या मानवीय सत्ता में स्वीकार न करें, क्योंकि वह इन सबसे अलग एक दिव्य अनुभूति हैं, एक शाश्वत जीवन, एक वर्तमान है।

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