अध्यक्षीय उदबोधन

Creation Feature

आवाज ही हमारे जीवन की दिशा बदल देती है

हर बात दूसरों पर आरोपित कर देना बुराई से छुट्टी पाने का सरल उपाय मान लिया जाता है, लेकिन है नहीं। उसने ऐसा कर दिया, इसलिए मुझे भी ऐसा करना पड़ा – यह कवच बन जाता है अपनी बुराई के लिए। जब तक अंतदृष्टि नहीं जागती, आदमी अपने भीतर उत्तर कर अपने आपको नहीं जानता-देखता तब तक उसे सारे आरोप दूसरों पर मढ़ना सबसे आसान विकल्प प्रतीत होता है। जब हम अपने आपको जानने की कोशिश करते हैं, हृदय की आवाज को सुनते हैं तब हमारे जीने का नजरिया बदल जाता है। हमारे जीवन की दिशा ही बदल जाती है। ईट-पत्थर के सब मंदिरों के ऊपर हृदय का मंदिर है। यही वह मंदिर है जो हमें स्वयं से स्वयं का साक्षात्कार कराता है। सत्य से रू-ब-रू कराता है।

आदमी अपने आपको नहीं जानता, अपने आपको नहीं देखता, यह दुनिया में सबसे बड़ा आश्चर्य है। प्रसि( लोकोकित्त है कि अपनी बु(ि से साध्ु होना अच्छा, लेकिन पराई बु(ि से राजा होना भी अच्छा नहीं है। हजारों मील दूरी पर होने वाली घटनाओं और परिवर्तनों को जानने वाला आदमी अपने भीतर घटित होने वाली घटनाओं और परिवर्तनों को नहीं जानता, क्या यह कम आश्चर्य है? इसी संदर्भ में महान दार्शनिक गेटे का कथन है कि यदि बात तुम्हारे हृदय से उत्पन्न नहीं हुई है तो तुम दूसरों के हृदय को कदापि प्रसन्न नहीं कर सकते।

स्वयं से स्वयं का संवाद न होने के कारण ही बुराइयों का चक्र चलता रहता है। वह कभी नहीं रुकता। आदमी बुराई करता है, पाप का आचरण करता है। प्रश्न होता है, वह पाप का आचरण क्यों करता है? इसके उत्तर में गीता में श्रीकृष्ण ने कहा, ‘आदमी को पाप में ध्केलने वाले शत्राु है – काम और क्रोध्। क्रोध् ज्ञान पर पर्दा डालता है। ऐसी माया पैदा करता है कि आदमी समझ ही नहीं पाता कि वह पाप कर रहा है। तब वह जानता हुआ भी नहीं जानता, देखता हुआ भी नहीं देखता। उसमें बुरे और भले का विवेक ही समाप्त हो जाता है और तब वह न करने योग्य कार्य भी कर लेता है।’ शेख सादी भी हमें स्वयं को स्वयं से या स्वयं को परमात्मा से जोड़ने की सलाह देते हैं।

दुनिया में सबसे कठिन काम है- स्वयं को जानना, स्वयं की सांसों को पहचानना, स्वयं के भीतर के संगीत को सुनना। गुरु नानक ने कहा था, ‘मनुष्य सांसों से बना है, एक बार में एक सांस। अगर सांस आती है तो हम मनुष्य में हैं, वरना मिट्टी के पुतले।’ अगर आप मानें तो जीवन और मृत्यु के बीच में सिपर्फ एक सांस का पफर्क है। सांस इतनी पवित्रा है। इन सांसों को जीने के लिए पवित्रा मन का होना जरूरी है।

शु( हृदय में ही प्रसन्नता बसती है। यही जीवन का संगीत है, विजय का नाद है। यह नाद हम तब सुनते हैं जब अपने भीतर देखने, खुद को पहचानने की प्रक्रिया से जुड़ते हैं। यहीं से आत्मविश्वास उपजता है। एमर्सन ने कहा है, ‘वे विजय कर सकते हैं, जिन्हें विश्वास है कि वे कर सकते हैं।’ जीवन की दिशा वे ही बदल सकते हैं जो बदलने की चाहत रखते हंै। जीवन की दिशा बदलती है अपने आपको जानने और देखने से। सुभाषचंद्र बोस ने कहा भी है कि जिस व्यक्ति के हृदय में संगीत का स्पंदन नहीं है, वह चिंतन और कर्म से कदापि महान नहीं बन सकता। मन की आवाज भी सुनना जरूरी हो जाता है।

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